लक्ष्मी नारायण मिश्र  

लक्ष्मी नारायण मिश्र
लक्ष्मी नारायण मिश्र
पूरा नाम लक्ष्मी नारायण मिश्र
जन्म 1903
जन्म भूमि आजमगढ़, उत्तर प्रदेश
मृत्यु 1987
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र लेखन
मुख्य रचनाएँ 'अंतर्जगत', 'राक्षस का मंदिर', 'मुक्ति का रहस्य', 'सिंदूर की होली', 'गरुड़ध्वज', 'नारद की वीणा', 'वितस्ता की लहरें' तथा 'मृत्युंजय' आदि।
भाषा हिन्दी
विद्यालय 'केंद्रीय हिन्दू कॉलेज', काशी
शिक्षा बी.ए. (1928)
प्रसिद्धि नाटककार, एकांकीकार
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी मिश्रजी के ऐतिहासिक और पौराणिक नाटक प्राय: एक विशेष काल हिन्दू संस्कृति के एक विशेष अध्याय और ज्वलंत चरित्र पर आधारित हैं। उनकी लिखी एकांकियों में भारत की आत्मा बसती है।
इन्हें भी देखें कवि सूची, साहित्यकार सूची

लक्ष्मी नारायण मिश्र (अंग्रेज़ी: Laxmi Narayan Mishra, जन्म- 1903, आजमगढ़, उत्तर प्रदेश; मृत्यु- 1987) हिन्दी के प्रसिद्ध नाटककार थे। हिन्दी के एकांकीकारों में उनका विशेष स्थान है। उन्होंने प्रचुर मात्रा में गद्य तथा पद्य दोनों में साहित्य सृजन किया है। लक्ष्मीनारायण जी पर पाश्चात्य नाटककार इन्सन, शा, मैटरलिंक आदि का ख़ासा प्रभाव था, लेकिन फिर भी उनकी एकांकियों में भारत की आत्मा बसती थी। मौलिक सृजन से लेकर अनुवाद तक उन्होंने सोद्देश्य लेखन किया।

परिचय

लक्ष्मी नारायण मिश्र जी का जन्म सन 1903 में उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ ज़िले के बस्ती नामक ग्राम में हुआ था। उन्होंने वर्ष 1928 में अपनी बी.ए. की परीक्षा 'केंद्रीय हिन्दू कॉलेज', काशी से उत्तीर्ण की थी।[1]

साहित्य सृजन

18 वर्ष की अवस्था से ही लक्ष्मी नारायण मिश्र साहित्य सृजन की ओर उन्मुख हुए। उनकी 'अंतर्जगत्' (1921-1922 ई.) नामक काव्य रचना उसी समय की है। इसके उपरांत आपकी नाटकीय प्रतिभा का उदय प्रारम्भ हुआ। 'अशोक' उनका पहला नाटक है।

नाट्य साहित्य

इनके समस्त नाट्य साहित्य के दो वर्ग हैं-

  1. सांस्कृतिक अथवा ऐतिहासिक
  2. सामाजिक

आधारभूत सत्य की दृष्टि से लक्ष्मीनारायण मिश्र के समूचे नाट्य-साहित्य में भारतीय संस्कृति के आदर्शों और मान्यताओं का प्रभाव है। सब नाटकों की शिल्पविधि और रूपगठन आधुनिक (पाश्चात्य) है, पर नाटक अपनी आंतरिक प्रकृति में पाय: भारतीय हैं; किंतु उस अर्थ में प्राचीन भारतीय और पाश्चात्य नाट्य-तत्त्वों का समंवय नहीं, जैसा कि जयशंकर प्रसाद के नाटकों में है। दूसरे ही स्तर पर मिश्रजी के नाटक अपने बहिरंग में आधुनिक पाश्चात्य नाट्य-शिल्प के अनुरूप हैं और आंतरिकता में विशुद्ध भारतीय हैं। यह सत्य वस्तुत: दृष्टिकोण और भावधारा के स्तर पर प्रतिष्ठित है। जहाँ एक शिल्प गठन का प्रश्न है, आपके नाटकों का विकास और निर्माण गीतों, स्वगत कथनों और भावुकतापूर्ण कवित्व वर्णनों के माध्यम से न होकर, बिल्कुल नये ढंग से होता है। ऐतिहासिक नाटकों में निश्चय ही तात्त्विक विवेचनों और सैद्धांतिक विचार विनिमय के गहन तत्त्व हैं। मिश्र जी ने इब्सन के दो प्रसिद्ध नाटक 'पिलर ऑफ़ द सोसाइटी' और 'डाल्स हाउस' का अनुवाद क्रमश: 'समाज के स्तम्भ' और 'गुड़िया का घर' नाम से किया है।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 1.3 हिन्दी साहित्य कोश, भाग 2 |प्रकाशक: ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी |संकलन: भारतकोश पुस्तकालय |संपादन: डॉ. धीरेंद्र वर्मा |पृष्ठ संख्या: 26 |
  2. इस महाकाव्य का आरम्भ सन 1953 में हुआ था, किंतु ये पूर्ण नहीं हो सका।

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