भारतीय संस्कृति  

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भारतीय संस्कृति
भारतीय संस्कृति के विभिन्न रूप
विवरण भारतीय संस्कृति भारत के विस्तृत इतिहास, साहित्य, विलक्षण भूगोल, विभिन्न धर्मों तथा उनकी परम्पराओं का सम्मिश्रण है। भारतीय संस्कृति को 'देव संस्कृति' कहकर भी सम्मानित किया गया है।
मुख्य भाषाएँ असमिया, बांग्ला, गुजराती, हिन्दी, कन्नड़, कश्मीरी, मराठी, मलयालम, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, तमिल, तेलुगु, उर्दू, सिंधी, कोंकणी, मणिपुरी, बोडो, डोगरी, मैथिली, संथाली आदि
साहित्य-दर्शन वेद, उपनिषद, पुराण, गीता, जैन साहित्य, बौद्ध साहित्य, वैशेषिक दर्शन, सांख्य दर्शन, दर्शन शास्त्र, जैन दर्शन, बौद्ध दर्शन आदि
धर्म हिन्दू, इस्लाम, जैन, बौद्ध, पारसी, सिक्ख धर्म, ईसाई
कला स्थापत्य कला, मूर्तिकला, चित्रकला, नृत्यकला, भारतीय संगीत (गायन, वादन)
प्रतीक , तुलसी, गाय, स्वस्तिक, पीपल, सूर्य, दीपक, तिलक, शिवलिंग, कमल, शंख आदि
मुख्य त्योहार दीपावली, रक्षाबंधन, होली, ईद-उल-फ़ितर, लोहड़ी, पोंगल, वैशाखी, विशु, बिहू
उत्सव और मेले कुम्भ मेला, यम द्वितीया, गुरु पूर्णिमा, जगन्नाथ रथयात्रा, खजुराहो नृत्य महोत्सव, अम्बुवासी मेला, पुष्कर मेला आदि
खान-पान भारतीय भोजन (निरामिष एवं सामिष)
मुख्य खेल कबड्डी, शतरंज, हॉकी, क्रिकेट, खो-खो, गुल्ली डंडा, निशानेबाज़ी, कुश्ती, मुक्केबाज़ी आदि

भारत के बहु-सांस्‍कृतिक भण्‍डार और विश्‍वविख्‍यात विरासत के सतत अनुस्‍मारक के रूप में भारतीय इतिहास के तीन हज़ार से अधिक वर्ष की जानकारी और अनेक सभ्‍यताओं के विषय में बताया गया है। भारत के निवासी और उनकी जीवन शैलियाँ, उनके नृत्‍य और संगीत शैलियाँ, कला और हस्‍तकला जैसे अन्‍य अनेक विधाएँ भारतीय संस्‍कृति और विरासत के विभिन्‍न वर्णों को प्रस्तुत करती हैं, जो देश की राष्ट्रीयता का सच्‍चा चित्र प्रस्‍तुत करते हैं। इस खण्‍ड में उन सभी तत्‍वों को शामिल किया गया है जो भारत की संस्‍कृति और विरासत के प्रतीक हैं। भारत की संस्कृति कई चीज़ों को मिला-जुलाकर बनती है जिसमें भारत का लम्बा इतिहास, विलक्षण भूगोल और सिन्धु घाटी की सभ्यता के दौरान बनी और आगे चलकर वैदिक युग में विकसित हुई, बौद्ध धर्म एवं स्वर्ण युग की शुरुआत और उसके अस्तगमन के साथ फली-फूली अपनी खुद की प्राचीन विरासत शामिल हैं। इसके साथ ही पड़ोसी देशों के रिवाज़, परम्पराओं और विचारों का भी इसमें समावेश है। भारतीय संस्कृति विश्व की प्रधान संस्कृति है, यह कोई गर्वोक्ति नहीं, बल्कि वास्तविकता है। हज़ारों वर्षों से भारत की सांस्कृतिक प्रथाओं, भाषाओं, रीति-रिवाज़ों आदि में विविधता बनी रही है जो कि आज भी विद्यमान है और यही अनेकता में एकता भारतीय संस्कृति की महान् विशेषता है।

सिंधु घाटी सभ्यता कालीन बर्तन

800 ई. से 1200 ई. का काल आर्थिक और सामाजिक जीवन तथा धर्म के लिए उपयुक्त है। आर्थिक व्यवस्था, समाज, धार्मिक विश्वास तथा मानव विचार राजनीति से कहीं कम परिवर्तनशील है। इसीलिए ऐसी कई विशेषताएँ जो नौवीं शताब्दी के पूर्व पायी जाती थीं, अभी भी ज़ारी थीं। पर साथ ही कुछ ऐसी भी बातें थीं, जिससे इस काल को पहले के युग से भिन्न माना जाता है। सामान्यतः इस ऐतिहासिक काल में नए तत्वों के साथ पुराने तत्त्व भी विद्यमान रहते हैं, पर परिवर्तन की दिशाएँ भिन्न रहती हैं।

वाणिज्य और व्यापार

उत्तर काल में यह काल सामान्यतः जड़ता तथा ह्रास का काल माना जाता है। इसका मुख्य कारण यह था कि सातवीं शताब्दी और दसवीं शताब्दी के बीच वाणिज्य और व्यापार में गतिरोध आ गया था। इसके परिणामस्वरूप इस क्षेत्र में नगरों तथा नागरिक जीवन का ह्रास हुआ। वाणिज्य और व्यापार में गतिरोध का मुख्य कारण पश्चिम में रोमन साम्राज्य का पतन था। जिसके साथ भारत का बड़े पैमाने पर तथा मुनाफ़े का व्यापार होता था। भारत में कभी भी बड़ी मात्रा में सोने और चाँदी के खनन का काम नहीं हुआ। सोना और चाँदी जिसके लिए भारत विख्यात था, वह भारत के लाभकारी व्यापार के कारण था क्योंकि मुनाफ़े के रूप में यहाँ सोना और चाँदी आते थे। इस्लाम के उदय से भी, जिससे सासानीद (ईरानी) जैसे प्राचीन साम्राज्यों का पतन हो गया, भारत के व्यापार और विशेष कर ज़मीन के रास्ते होने वाले व्यापार पर बहुत असर पड़ा। परिणामस्वरूप उत्तरी भारत में आठवीं और दसवीं शताब्दी के बीच नई स्वर्ण मुद्राओं की बहुत कमी हो गई। पश्चिम एशिया तथा उत्तरी अफ्रीका में विस्तृत और शक्तिशाली अरब साम्राज्य में ऐसे कई क्षेत्र शामिल थे जिनमें बड़ी मात्रा में ख़ानों से स्वर्ण निकाला जाता था। अरब स्वयं भी समुद्र प्रेमी व्यक्ति थे। भारतीय कपड़ों, मसालों तथा लोबान के लिए अमीर अरब शासकों की माँग के कारण भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के द्वीपों को मसालों के द्वीप के नाम से जाना जाता था। नौवीं और दसवीं शताब्दी के बीच कई अरब यात्री पश्चिमी तट के नगरों में आए और उन्होंने देश की तत्कालीन स्थिति का विवरण किया है। दसवीं शताब्दी के बाद उत्तर भारत में विदेश व्यापार और वाणिज्य में धीरे-धीरे फिर वृद्धि हुई। व्यापार के इस पुनरुत्थान से सबसे अधिक लाभ मालवा और गुजरात को पहुँचा। गुजरात में चंपानेर और अंकिलेश्वर जैसे कई नगरों की नींव इसी काल में पड़ी। उन दिनों भारत की जनसंख्या दस करोड़ से भी कम थी, अर्थात् आज की तुलना में, छटे हिस्से से भी कम थी। देश का एक बड़ा भाग जंगलों से ढका था जिनमें जंगली पशुओं के अलावा ऐसे क़बीले थे जो राहगीरों को लूट लेते थे। नदियों पर पुल नहीं थे और बरसात के मौसम में सड़कें बहुत ख़राब हो जाती थीं। इन कारणो से उन दिनों यात्रा, चाहे व्यापार हो या फिर शौक़ के लिए, कभी भी खतरे से ख़ाली नहीं थी। सुरक्षा के ध्यान से व्यापारी तथा अन्य लोग कारवों में चलते थे जिसकी सुरक्षा उनके अपने सैनिक करते थे। इसके बावजूद कभी-कभी साहसी लुटेरे उन्हें लूट लेते थे।
बच्चे के साथ महिला, मोन, नागालैंड

उपजातियों का रूप

उस समय की कहानियों की किताबों में यात्रा के ख़तरों का बड़ा रोचक वर्णन मिलता है। गाँवों में जीवन और सम्पत्ति की असुरक्षा से यात्रा और भी कठिन थी और इस कारण भी वाणिज्य और व्यापार का ह्रास हुआ। इससे एक नये समाज का उदय हुआ जिसमें ग्रामीण क्षेत्र आर्थिक दृष्टि से अधिक आत्म-निर्भर होते गए। कुछ लोग समाज के इस विकास को सामंतवाद के विकास के साथ जोड़ते हैं। आंतरिक व्यापार के ह्रास से उत्तर भारत में व्यापार संघ, जिन्हें श्रेणी और संघ कहा जाता था, भी कमज़ोर पड़े। इन व्यापार संघों में अधिकतर विभिन्न जाति के लोग थे पर श्रेणियों के आचरण के अपने नियम थे जो इसके सभी सदस्यों को मानने पड़ते थे। वे पैसों के लेन-देन तथा दान प्राप्त करने का भी अधिकार रखते थे। वाणिज्य और व्यापार के ह्रास के साथ-साथ इन संघों का महत्त्व भी कम हो गया। इस काल में इन संघों द्वारा दान प्राप्त करने की बहुत कम चर्चा उपलब्ध है। कालान्तर में कुछ पुरानी श्रेणियों ने उपजातियों का रूप धारण कर लिया, उदाहरणार्थ - दास, वैश्यों की एक उपजाति बन गया। व्यापारी वर्ग अधिकतर जैन धर्म के समर्थक थे, इसलिए उनके साथ जैन धर्म भी कमज़ोर पड़ गया।

वाणिज्य और व्यापार के ह्रास की झलक इस काल की विचारधारा में भी मिलती है। इस काल में रचित कुछ धर्मशास्त्रों ने विदेश यात्रा को निषिद्ध माना है। उनके अनुसार उस जगह नहीं जाना चाहिए जहाँ मुंज घास नहीं उगती हो और जहाँ काले हिरण विचरण नहीं करते हों। कहने का तात्पर्य यह है कि भारत के बाहर की यात्रा नहीं करनी चाहिए। इनके अनुसार नमकीन समुद्र की यात्रा करने से आदमी दूषित हो जाता है। यह अवश्य था कि इन प्रतिबन्धों को सभी पूरी तरह नहीं मानते थे। भारतीय व्यापारियों, दार्शनिकों, चिकित्साशास्त्रियों तथा हस्तकला विशेषज्ञों के वृत्तान्त मिलते हैं जिन्होंने पश्चिम एशिया में बग़दाद तथा अन्य शहरों की यात्रा कीं। धर्मशास्त्रों का प्रतिबन्ध शायद ब्राह्मणों के लिए ही था या फिर वे इस भय से लगाए गए थे कि कहीं भारतीय बड़ी संख्या में विदेश जाकर ऐसे विरोधी धार्मिक विचार या सामाजिक समानता के विचार भारत में न ले आएँ जो ब्राह्मणों और शासक वर्ग को अमान्य हों।

धर्मशास्त्रों द्वारा समुद्र यात्रा पर प्रतिबन्ध

समुद्र यात्रा पर धर्मशास्त्रों द्वारा लगाए गए प्रतिबन्धों का दक्षिण-पूर्व एशिया तथा चीन के साथ होने वाले व्यापार पर कोई असर नहीं पड़ा। भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के बीच छठी शताब्दी से ही बड़े पैमाने पर व्यापार आरम्भ हो गया था। उस क्षेत्र के देशों का विस्तृत भौगोलिक ज्ञान उस समय के साहित्य में परिलक्षित है। 'हरिसेन' की 'वृहतकथा कोष' जैसी उस काल की किताबों में इस क्षेत्र के पहनावे और भाषाओं आदि के बारे में विस्तृत चर्चा की है। इस क्षेत्र में चमत्कारी समुद्रों में भारतीय व्यापारियों की कई रोमांचकारी कहानियाँ हैं जो बाद में विख्यात 'सिंदबाद की कहानियों' का आधार बनी। अनेक भारतीय व्यापारी इन देशों में बस तक गए और कुछ लोगों ने स्थानीय लोगों से शादी-विवाह भी कर लिया। व्यापारियों के पीछे-पीछे धर्म प्रचारक भी आए और इस प्रकार इस क्षेत्र में बौद्ध तथा हिन्दू धर्मों का प्रादुर्भाव हुआ। जावा में बोरोबोदुर के बौद्ध तथा अंकोरवाट के हिन्दू मन्दिरों से हमें इस क्षेत्र में इन धर्मों के प्रचार के बारे में पता चलता है। इस क्षेत्र के कुछ शासक हिन्दू धर्म से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने भारत के साथ व्यापारिक तथा सांस्कृतिक सम्बन्धों का स्वागत किया। इस प्रकार भारतीय और स्थानीय संस्कृतियों के सम्मिश्रण से नयी सांस्कृतिक और साहित्यिक धाराओं का जन्म हुआ।

जावा और सुमात्रा आदि की यात्रा के लिए मुख्य भारतीय बंदरगाह बंगाल का ताम्रलिप्ति था। इस काल की कई कहानियों में हमें भारतीय व्यापारियों की ताम्रलिप्ति से सुवर्णद्वीप (आधुनिक इंडोनेशिया) और कटाहा (मलाया में केदाह) की यात्रा के लिए रवाना होने की चर्चा मिलती है। जावा के चौदहवीं शताब्दी के एक लेखक के अनुसार वहाँ बड़ी संख्या में जम्बूद्वीप (भारत), कर्नाटक (दक्षिण भारत) तथा गौड़ (बंगाल) के लोग बड़े-बड़े जहाजों में आते थे। इस व्यापार में गुजरात के व्यापारी भी भाग लेते थे।

भारत और चीन का व्यापार

भारत का दक्षिण पूर्व एशिया के साथ व्यापार स्वयं में महत्त्वपूर्ण तो था ही इसके साथ-साथ वह भारत और चीन के व्यापार के लिए केन्द्र का कार्य भी करता था। आमतौर पर चीनी जहाज़ मोलस्का द्वीपों के आगे नहीं आते थे। उधर भारत और चीन के बीच का सड़क मार्ग उस काल में तुर्क, अरब तथा चीनियों के बीच संघर्ष के कारण सुरक्षित नहीं रह गया था। इसके स्थान पर भारत और चीन के बीच का समुद्री मार्ग अधिक महत्त्व का होता जा रहा था। चीन के विदेश व्यापार के लिए वहाँ का प्रमुख बंदरगाह कैटन, या जैसा कि अरब यात्री पुकारते थे, क़ाफु था। भारत से बौद्ध विद्वान् भी समुद्र मार्ग से चीन जाते थे। चीनी इतिहासकारों ने लिखा है कि दसवीं शताब्दी के अंत तथा ग्यारहवीं शताब्दी के आरम्भ में चीनी राजदरबार में जितने भारतीय भिक्षु थे, उतने चीन के इतिहास में पहले कभी नहीं रहे। कुछ और पहले के काल के चीनी वृत्तान्त के अनुसार कैटन नदी भारत, फ़ारस और अरब से आने वाले जहाजों से भरी रहती थी। इसके अलवा कैटन में तीन हिन्दू मन्दिर थे जिनमें भारतीय ब्राह्मण रहते थे। चीनी समुद्र में भारतीयों की उपस्थिति के बारे में हमें जापानी सूत्रों से भी पता चलता है। इनके अनुसार जापान में कपास के परिचय का श्रेय दो भारतीयों को है। जो अपनी समुद्री यात्रा के दौरान लहरों के ज़ोर से ग़लती से जापान पहुँच गए थे। भारतीय शासकों, विशेषकर बंगाल के पाल, सेन तथा दक्षिण के पल्लव और चोल वंश के शासकों ने चीनी सम्राटों के दरबारों में अपने राजदूत भेज कर इस व्यापार को और उत्साहित करने की चेष्टा की। चीन के साथ भारत के व्यापार में बाधा डालने वाले मलाया तथा अन्य पड़ोसी देशों के विरुद्ध चोल शासक राजेन्द्र प्रथम ने अपनी नौसेना भेजी। चीन के साथ व्यापार करने वाले देशों को इतना लाभ होता था कि तेरहवीं शताब्दी में चीनी सरकार ने वहाँ से सोने और चाँदी के निर्यात पर प्रतिबन्ध लगाने की चेष्टा की। धीरे-धीरे भारत का व्यापार अरबों और चीनियों के मुक़ाबले कम होता गया क्योंकि इन व्यापारियों के जहाज़ भारतीय जहाजों से बड़े और अधिक तेज़ थे। कहा जाता है कि चीनी जहाज़ कई मंज़िल होते थे और उनमें चार सौ सैनिकों के अलावा छः सौ यात्री चल सकते थें चीनी जहाजों के विकास में कुतुबनुमा की बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। यह आविष्कार चीन से दसवीं शताब्दी में पश्चिम पहुँचा। अब तक भारतीय विज्ञान तथा तकनीक पीछे पड़ते जा रहे थे।

पश्चिम के साथ भारत का व्यापार दसवीं शताब्दी के बाद ही तेज़ हो सका, पर दक्षिण-पूर्व एशिया तथा चीन के साथ उसका व्यापार बारहवीं शताब्दी तक धीरे-धीरे बढ़ता ही गया। इस व्यापार में भारत तथा बंगाल की मुख्य भूमिका थी। इन क्षेत्रों की सम्पत्ति और समृद्धी का भी यही प्रमुख कारण था।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. जिनको भोग कहा जाता था
  2. जिसकी रचना कश्मीर में बारहवीं शताब्दी में हुई थी
  3. एक प्रकार की खारी सब्जी
  4. सिर तथा छाती को छोड़ कर
  5. अर्थात् जब उसका कुछ अता-पता नहीं चलता हो

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