विनायक कृष्ण गोकाक  

विनायक कृष्ण गोकाक
विनायक कृष्ण गोकाक
पूरा नाम विनायक कृष्ण गोकाक
अन्य नाम वी.के. गोकाक
जन्म 9 अगस्त, 1909
जन्म भूमि हावेरी ज़िला, कर्नाटक
मृत्यु 28 अप्रैल, 1992
मृत्यु स्थान बेंगळूरू
कर्म भूमि कर्नाटक, भारत
कर्म-क्षेत्र कवि, उपन्यासकार, समालोचक, नाटककार और निबंध लेखक
मुख्य रचनाएँ 'भारत सिंधु रश्मि' (1982), 'कलोपासक' (1934), 'समुद्र गीतेगळु' (1940), 'जन-नायक' (1939), 'युगांतर' (1947) आदि।
भाषा कन्नड़ भाषा
पुरस्कार-उपाधि ज्ञानपीठ पुरस्कार, पद्मश्री, साहित्य अकादमी पुरस्कार
नागरिकता भारतीय
इन्हें भी देखें कवि सूची, साहित्यकार सूची

विनायक कृष्ण गोकाक (अंग्रेज़ी: Vinayaka Krishna Gokak, जन्म: 9 अगस्त, 1909 - मृत्यु: 28 अप्रैल, 1992) को 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' से सम्मानित कन्नड़ भाषा के प्रमुख साहित्यकारों में गिना जाता है। डॉ. वियानक कृष्ण गोकाक का 'कन्नड़ साहित्य' में नि.संदेह एक विशिष्ट स्थान है। कवि, उपन्यासकार, समालोचक, नाटककार और निबंध लेखक के रूप में आधी से भी अधिक शताब्दी का उनका सक्रिय कार्यकाल 1934 में आरम्भ हुआ, जब उनका प्रथम कविता संकलन 'कलोपासक' प्रकाशित हुआ था।

कन्नड़ कविता में योगदान

गोकाक ने कन्नड़ कविता को स्वतंत्रता का उपहार दिया, जिससे नए क्षितिज खुले और नई संभावनाओं का जन्म हुआ। प्राच्य और पाश्चात्य, अतीत और वर्तमान, वर्तमान और भविष्य, मानवतावाद और अध्यात्म तथा राष्ट्रीय और वैश्विक के मध्य सामंजस्य की स्थापना में जीवन भर क्रियाशील गोकाक समन्वय के सिद्धांत पर आरूढ़ थे। अपने गुरु श्री अरबिंद की भांति उनकी आस्था थी कि आत्मिक विकास करते-करते मनुण्य विश्व-मानव के रूप मे सिद्ध हो सकता है।

नए युग का सूत्रपात

चौथे दशक के आरंभ मे काव्य की ओर उन्मुख युवक गोकाक दत्तात्रेय रामचन्द्र बेंद्रे के प्रभाव में आए और उनके नेतृत्व में काव्य के एक नए युग का सूत्रपात करने में संलग्न कवि मंडली के एक सदस्य के रूप मे गोकाक ने स्वप्नों और आदर्शों, आध्यात्यिक अभिलाषाओं और काव्यगत प्रेरणाओं की स्वच्छंदवादी कविता का सृजन किया, 'कलोपासक' (1934) में नई पंरपराओं के गीत संकलित हैं। 'समुद्र गीतेगळु' (1940) की कविताएँ एक नई ताज़गी देती हैं और उनमें गोकाक की वह वाणी मुखर हुई है, जिसमें सहज अभिव्यंजना और फक्कड़पन के साथ गीतात्मकता है। स्वातंत्र्योत्तर भारत की नई प्रवृतियों की पूर्ति उन्होंने एक अभिनव काव्य-शैली के सूत्रपात द्वारा की, इस कविता को उन्होंने इलियट,पाउंड और फ़्राँसीसी प्रतीकवादियों के अनुसरण में 'नव्य' कविता कहा। नए विषयों, नई कल्पनाओं, नई कल्पनाओं, नई लयों, नई वक्रोक्तियों और व्यंग्यों के प्रयोगों से भरपूर 'नव्य कवितेगळु' (1950) ने कन्नड़ कविता में एक 'नव्य युग' का सूत्रपात किया।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

बाहरी कड़ियाँ

संबंधित लेख

और पढ़ें

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः



"http://m.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=विनायक_कृष्ण_गोकाक&oldid=634353" से लिया गया