श्रीलाल शुक्ल  

श्रीलाल शुक्ल
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पूरा नाम श्रीलाल शुक्ल
जन्म 31 दिसंबर, 1925 ई.
जन्म भूमि अतरौली गाँव, लखनऊ
मृत्यु 28 अक्तूबर, 2011 ई.
मृत्यु स्थान लखनऊ,भारत
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र साहित्यकार, लेखक
मुख्य रचनाएँ 'सूनी घाटी का सूरज', 'आओ बैठ लें कुछ देर', 'अंगद का पांव', 'राग दरबारी', 'अज्ञातवास', 'आदमी का ज़हर', 'इस उम्र में', 'उमराव नगर में कुछ दिन', 'कुछ ज़मीन पर कुछ हवा में', 'ख़बरों की जुगाली', 'विश्रामपुर का संत', 'मकान', 'सीमाएँ टूटती हैं', 'संचयिता', 'जहालत के पचास साल', 'यह घर मेरा नहीं है'।
विषय व्यंग्य, उपन्यास, विनिबंध, आलोचना
भाषा अवधी, अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत और हिन्दी
शिक्षा इलाहाबाद विश्‍वविद्‍यालय से स्नातक
पुरस्कार-उपाधि साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1999 में व्यास सम्मान, 2005 में यश भारती, 2008 में पद्मभूषण, 2009 का ज्ञानपीठ पुरस्कार लोहिया सम्मान, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, शरद जोशी सम्मान।
प्रसिद्धि राग दरबारी, व्यंग्य लेखन
विशेष योगदान उपन्यासकार व व्यंग्यकार के रूप में प्रतिष्ठित, 130 से अधिक पुस्तकों का लेखन।
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी 1949 में राज्य सिविल सेवा (पी.सी.एस.) में चयनित, 1983 में भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के सेवानिवृत्त।
इन्हें भी देखें कवि सूची, साहित्यकार सूची

श्रीलाल शुक्ल (अंग्रेज़ी: Srilal Sukla, जन्म: 31 दिसंबर, 1925; मृत्यु: 28 अक्टूबर, 2011) को लखनऊ जनपद के समकालीन कथा-साहित्य में उद्देश्यपूर्ण व्यंग्य लेखन के लिये विख्यात साहित्यकार माने जाते थे। उन्होंने 1947 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक परीक्षा पास की। 1949 में राज्य सिविल सेवा से नौकरी शुरू की। 1983 में भारतीय प्रशासनिक सेवा से निवृत्त हुए। उनका विधिवत लेखन 1954 से शुरू होता है और इसी के साथ हिंदी गद्य का एक गौरवशाली अध्याय आकार लेने लगता है।

व्यक्तित्व

श्रीलाल शुक्ल का व्यक्तित्व अपनी मिसाल आप था। सहज लेकिन सतर्क, विनोदी लेकिन विद्वान, अनुशासनप्रिय लेकिन अराजक। श्रीलाल शुक्ल अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत और हिन्दी भाषा के विद्वान थे। श्रीलाल शुक्ल संगीत के शास्त्रीय और सुगम दोनों पक्षों के रसिक-मर्मज्ञ थे। 'कथाक्रम' समारोह समिति के वह अध्यक्ष रहे। श्रीलाल शुक्ल जी ने ग़रीबी झेली, संघर्ष किया, मगर उसके विलाप से लेखन को नहीं भरा। उन्हें नई पीढ़ी भी सबसे ज़्यादा पढ़ती है। वे नई पीढ़ी को सबसे अधिक समझने और पढ़ने वाले वरिष्ठ रचनाकारों में से एक रहे। न पढ़ने और लिखने के लिए लोग सैद्धांतिकी बनाते हैं। श्रीलाल जी का लिखना और पढ़ना रुका तो स्वास्थ्य के गंभीर कारणों के चलते। श्रीलाल शुक्ल का व्यक्तित्व बड़ा सहज था। वह हमेशा मुस्कुराकर सबका स्वागत करते थे। लेकिन अपनी बात बिना लाग-लपेट कहते थे। व्यक्तित्व की इसी ख़ूबी के चलते उन्होंने सरकारी सेवा में रहते हुए भी व्यवस्था पर करारी चोट करने वाली राग दरबारी जैसी रचना हिंदी साहित्य को दी।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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