महाकाव्य  

महाकाव्य
रघुवंश महाकाव्य
विवरण साहित्य की परिधि के अन्तर्गत महाकाव्यों का विशेष महत्त्व है। भारत में 'रामायण' और महाभारत अद्यतन महाकाव्यों के उद्गम और प्रेरणा के स्रोत रहे हैं।
मूल तत्त्व
  1. उदात्त कथानक
  2. उदात्त कार्य अथवा उद्देश्य
  3. उदात्त चरित्र
  4. उदात्त भाव
  5. उदात्त शैली
विशेष महाकाव्य के जिन लक्षणों का निरूपण भारतीय आचार्यों ने किया, शब्दभेद से उन्हीं से मिलती जुलती विशेषताओं का उल्लेख पश्चिम के आचार्यों ने भी किया है।
संबंधित लेख खंड काव्य, काव्य, कविता, प्रबोधक काव्य, प्रबन्ध काव्य
अन्य जानकारी संस्कृत काव्यशास्त्र में महाकाव्य का प्रथम सूत्रबद्ध लक्षण आचार्य भामह ने प्रस्तुत किया और परवर्ती आचार्यों में दंडी, रुद्रट तथा विश्वनाथ ने अपने अपने ढंग से इस लक्षण का विस्तार किया।

राष्ट्रीय एकता प्रत्येक देश के लिए महत्त्वपूर्ण है। राष्ट्रीय एकता की आधारशिला है सांस्कृतिक एकता और सांस्कृतिक एकता का सबसे प्रबल माध्यम साहित्य की परिधि के अन्तर्गत महाकाव्यों का विशेष महत्व है, जिनके वृहत् कलेवर में राष्ट्रीय एकता को प्रभावी रीति से प्रतिफल करने का पूर्ण अवसर रहता है। भारतीय महाकाव्य का आयोजन इसी से प्रेरित होकर किया गया है। इसमें तीन प्राचीन भाषाओं - संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और अंग्रेज़ी को मिलाकर तेरह आधुनिक भाषाओं के 26 प्रमुख महाकाव्यों का विवेचनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। काव्य-वस्तु की दृष्टि से महाकाव्य पाँच प्रकार के है -

  1. रामायण महाकाव्य,
  2. महाभारत महाकाव्य,
  3. चरितकाव्य,
  4. रम्याख्यान और
  5. दार्शनिक या प्रतीकात्मक महाकाव्य।
  • यह कार्य विभिन्न भाषाओं के अधिकारी विद्वानों द्वारा संपन्न हुआ है।

भारत में रामायण और महाभारत अद्यतन महाकाव्यों के उद्गम और प्रेरणा के स्रोत रहे हैं। परवर्ती महाकाव्यों की रचना सार्वजनिक वाचक के लिए नहीं, वरन् कलाकृति के रूप में हुई है। इसलिए इन्हें ‘कलात्मक महाकाव्य’ की संज्ञा देना उपयुक्त होगा। इस वर्ग के महाकाव्यों की भारत में एक सुदीर्घ परंपरा है - जो ‘कुमारसंभव’रघुवंश’ आदि संस्कृत महाकाव्यों से आरंभ होकर आधुनिक भाषाओं में ‘कामायनी’ तथा ‘श्रीरामायण दर्शनम्’ आदि तक निरंतर प्रवाहमान है। ललित काव्य की एक विधा का रूप धारण कर महाकाव्य 'साहित्यशास्त्र' का विषय बन गया और आचार्यों ने साहित्य की अन्य विधाओं की भाँति उसे भी लक्षणवद्ध कर दिया।[1] महाकाव्य संस्कृत काव्यशास्त्र में महाकाव्य का प्रथम सूत्रबद्ध लक्षण आचार्य भामह ने प्रस्तुत किया है और परवर्ती आचार्यों में दंडी, रुद्रट तथा विश्वनाथ ने अपने अपने ढंग से इस लक्षण का विस्तार किया है। आचार्य विश्वनाथ का लक्षणनिरूपण इस परंपरा में अंतिम होने के कारण सभी पूर्ववर्ती मतों के सारसंकलन के रूप में उपलब्ध है।

महाकाव्य की विशेषताएँ

महाकाव्य की विशेषताएँ सामान्यत: इस प्रकार है-

  1. ‘महाकाव्य’ पद में उपयुक्त ‘महा’ विशेषण एक ओर उसके महान् कलेवर अर्थात विपुल-व्यापक आकार और दूसरी ओर उसकी महान् विषय-वस्तु अर्थात प्रतिपाद्य विषय की गौरव-गरिमा का समान रूप से द्योतन करता है।
  2. आकार की व्यापकता का अर्थ है कि उनमें जीवन का सर्वांग-चित्रण रहता है। प्रभावशाली महापुरुष का जीवन होने के कारण उसका विस्तार अनायास ही संपूर्ण देशकाल तक हो जाता है। अतः महाकाव्य की कथा-परिधि में जीवन के समस्त सामाजिक, राजनीतक पक्ष एवं आयाम और उनके परिवेश रूप में विभिन्न दृश्यों और रूपों का समावेश रहता है। ये सभी वर्णन साधारण जीवन की क्षुद्रताओं से मुक्त एक विशेष स्तर पर अवस्थित रहते हैं।
  3. महाकाव्य की कथावस्तु एक महान् उद्देश्य से परिचालित होती है। अनेक संघर्षों से गुजरती हुई वह अंततः महत्तर मानव-मूल्यों की प्रतिष्ठा करती है। इन महत्तर मानव-मूल्यों की प्रतिष्ठा अंततः जिस घटना के द्वारा होती है, वहीं महाकाव्य का महत्कार्य होता है।
  4. महान कार्य की सिद्धि के लिए यह आवश्यक है कि उसका साधक उसके अनुरूप चारित्रक गुणों और शक्तियों से सम्पन हो। अतः महाकाव्य का नायक अथवा केन्द्रीय पात्र असाधारण शक्ति और गुणों से सम्पन्न होता है और ये गुण उसके सहयोगी तथा विरोधी पात्रों में भी विभिन्न अनुपातों में विद्यमान रहते हैं।
  5. उपर्युक्त संसार को वहन करने में समर्थ महाकाव्य की शैली भी स्वभावतः अत्यन्त गरिमा-विशिष्ट होनी चाहिए। इसलिए आचार्यों ने यह अवस्था दी है कि महाकाव्य की शैली साधारण स्तर से भिन्न, क्षुद्र प्रयोगों से मुक्त अलंकृत होनी चाहिए। पाश्चात्य काव्यशास्त्र में यूनानी-रोमी आचार्य लोंजाइनस से प्रेरणा प्राप्त कर अनेक सुधी समीक्षकों ने इस संदर्भ में ‘उदात्य तत्व’ पर विशेष बल दिया गया है जो महाकाव्य की मूल चेतना को अभिव्यक्ति करने में अपेक्षाकृत अधिक सक्षम है। अतः उसके आधार पर उदात्त कथानक, उदात्त कार्य अथवा उद्देश्य, उदात्त चरित्र, उदात्त भाव-संपदा और उदात्त शैली को महाकाव्य के मूल तत्वों के रूप में रेखांकित किया गया है।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 भारतीय महाकाव्य (हिन्दी) भारतीय साहित्य संग्रह। अभिगमन तिथि: 1 जुलाई, 2011।
  2. देवता या सदृश
  3. रस
  4. धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष
  5. छंद
  6. साहित्यदर्पण, परिच्छेद 6,315 - 324
  7. अष्टाधिक सर्गों में
  8. महाकाव्य और त्रासदी
  9. भाषा
  10. जातीय दंतकथाओं पर आश्रित

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