गोविंद शंकर कुरुप  

गोविंद शंकर कुरुप
गोविंद शंकर कुरुप
पूरा नाम गोविंद शंकर कुरुप
जन्म 5 जून, 1901
जन्म भूमि नायत्तोट, केरल
मृत्यु 2 फ़रवरी, 1978
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र साहित्य
मुख्य रचनाएँ साहित्य कौतुकम, विश्वदर्शनम, लेखमाल, जीवनसंगीतम्, संध्य, इरूट्टिनु मुंपु आदि।
भाषा मलयालम
पुरस्कार-उपाधि 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' (1963) और 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' (1965)
प्रसिद्धि साहित्यकार
नागरिकता भारतीय
इन्हें भी देखें कवि सूची, साहित्यकार सूची

गोविंद शंकर कुरुप (अंग्रेज़ी: Govind Sankara Kurup, जन्म- 5 जून, 1901, नायत्तोट, केरल; मृत्यु- 2 फ़रवरी, 1978) 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' से सम्मानित मलयाली भाषा के एक प्रसिद्ध साहित्यकार थे। उन्होंने कोचीन राज्य की 'पंडित' परीक्षा पास करके अध्यापन की योग्यता प्राप्त की थी। उसके बाद दो वर्ष तक वे यहाँ-वहाँ अध्यापन कार्य भी करते रहे थे। 'महाकवि' गोविंद शंकर कुरुप की 40 से अधिक मौलिक और अनूदित कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं।

जन्म

गोविंद शंकर कुरुप का जन्म 5 जून, 1901 ई. को केरल के नायत्तोट नामक स्थान पर हुआ था। अपने मामा ‘गोविंद’ के नाम पर ही उनका नाम 'गोविंद शंकर कुरूप पड़ा'। परिवार में वंश परंपरा मातृकुल से चलने की प्रथा होने के कारण इनका कुलनाम भी 'कुरुप' हुआ। संयोग से उन्हीं दिनों नायत्तोट में एक प्राथमिक पाठशाला की स्थापना हुई। बालक कुरुप को वहाँ भर्ती करा दिया गया। गोविंद शंकर ने वहाँ जाकर अनुभव किया कि प्राकृतिक दृश्य-छवियों को देखकर उनके भीतर स्वत: स्फूर्त एक अरुप और विचित्र-सा आलोड़न होता है, जिसका अब उन्हें ज्ञान होने लगा था। गोविंद शंकर के जीवन में दो घटनाएँ भी उसी समय घटीं, जो यूँ तो सामान्य थीं, पर कवि शंकर कुरुप की काव्य–चेतना के प्रथम अंकुर फूटने में परोक्ष रूप से सहायक सिद्ध हुई। एक थी उस युग के वरिष्ठ मलयालम कवि कुंजीकुट्टन तंपुरान का नायत्तोट आना और दूसरी थी, नौका से तोट्टवाय देवालय जाते हुए उगते सूर्य के प्रथम स्पर्श से लहरियों के नर्तन का दर्शन।

शिक्षा

बचपन में ही गोविंद शंकर के पिता की आशीष-छाया सिर से उठ जाने के बाद उनकी देखरेख और शिक्षा आदि का दायित्व उनके मामा गोविंद कुरुप ने निभाया। गांव की उस प्राथमिक पाठशाला में शिक्षा का प्रबंध तीसरी कक्षा तक ही था। फिर किसी प्रकार व्यवस्था करके बालक कुरुप को 7 मील (लगभग 11.2 कि.मी.) दूर स्थित पेरुंपावूर के मलयालम मिडिल स्कूल भेजा गया। पेरुंपावूर में छात्रावास के जीवन में एक मुक्त वातावरण मिला, जो कवि शंकर की अस्फुट प्रतिभा के जागृत होने में विशेष प्रेरक व सहायक हुआ। वहाँ एक सघंन वन था, जहाँ लता-कुंजों से घिरा भगवती वनदेवी का एक अर्द्धभग्न मंदिर था। नाना पक्षियों का कलरव–कूजन निरंतर चलता रहता था। प्रकृति `की उस उन्नमुक्त शोभाराशि से मुग्ध हुए शंकर घंटों-घंटों वहाँ बैठे रहते और प्राय: संस्कृत छंदों में फुटकर श्लोकों की रचना करते। सातवीं कक्षा के गोविंद शंकर जी मूवाट्टुपुषा मलयालम हाईस्कूल पहुंचे। वहाँ दो वर्ष रहे, पर ये दो वर्ष उनके विकास की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण और एक प्रकार से दिशा निर्णायक सिद्ध हुए।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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