अमरकांत  

अमरकांत
अमरकांत
पूरा नाम अमरकांत
अन्य नाम श्रीराम लाल, अमरनाथ
जन्म 1 जुलाई, 1925
जन्म भूमि नगरा गाँव, बलिया ज़िला, उत्तर प्रदेश
मृत्यु 17 फ़रवरी, 2014
मृत्यु स्थान इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश
अभिभावक सीताराम वर्मा, अनंती देवी
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र हिन्दी कथा साहित्य
मुख्य रचनाएँ 'ज़िंदगी और जोक', 'देश के लोग', 'मौत का नगर', 'तूफान', 'सूखा पत्ता', 'ग्राम सेविका', 'बीच की दीवार', 'इन्हीं हथियारों से', 'बानर सेना' आदि।
भाषा हिन्दी
विद्यालय 'गवर्नमेन्ट हाई स्कूल' और 'सतीशचन्द्र इन्टर कॉलेज', बलिया; 'इलाहाबाद विश्वविद्यालय'
शिक्षा बी.ए.
पुरस्कार-उपाधि साहित्य अकादमी सम्मान (2007), ज्ञानपीठ पुरस्कार (2009), व्यास सम्मान (2010)
प्रसिद्धि साहित्यकार व लेखक
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी पहले अमरकांत जी का नाम 'श्रीराम' रखा गया था। इनके खानदान में लोग अपने नाम के साथ 'लाल' लगाते थे।
इन्हें भी देखें कवि सूची, साहित्यकार सूची

अमरकांत (अंग्रेज़ी: Amarkant, जन्म: 1 जुलाई, 1925; मृत्यु: 17 फ़रवरी, 2014) भारत के प्रसिद्ध साहित्यकारों में से एक थे। वे हिन्दी कथा साहित्य में प्रेमचंद के बाद यथार्थवादी धारा के प्रमुख कहानीकार थे। प्रयाग विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद अमरकांत ने निश्चय कर लिया था कि उन्हें हिन्दी साहित्य की सेवा करनी है। मन में पत्रकार बनने की इच्छा थी और उन्होंने आगरा शहर से निकलने वाले दैनिक पत्र 'सैनिक' से अपनी नौकरी की शुरूआत की। अमरकांत सदैव ही संकोची व्यक्ति रहे। आम जनता से जुड़ी हुई कोई भी बात उन्हें साधारण नहीं लगती थी। देश में होने वाली हर महत्त्वपूर्ण घटना पर उनकी बारीक नज़र रहती थी। वे खुद यह कभी भी पसंद नहीं करते थे कि वे चर्चा के केन्द्र में रहें।

जन्म तथा नामकरण

अमरकांत का जन्म 1 जुलाई, 1925 को नगरा गाँव, तहसील रसड़ा, बलिया ज़िला (उत्तर प्रदेश) के एक कायस्थ परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम सीताराम वर्मा व माता का नाम अनंती देवी था। पहले अमरकांत का नाम 'श्रीराम' रखा गया था। इनके खानदान में लोग अपने नाम के साथ 'लाल` लगाते थे। अत: अमरकांत का भी नाम 'श्रीराम लाल` हो गया। बचपन में ही किसी साधु-महात्मा द्वारा अमरकांत का एक और नाम 'अमरनाथ' रखा गया था। यह नाम अधिक प्रचलित तो नहीं हुआ, किंतु स्वयं श्रीराम लाल को इस नाम के प्रति आसक्ति हो गयी। इसलिए उन्होंने कुछ परिवर्तन करके अपना नाम 'अमरकांत` रख लिया। उनकी साहित्यिक कृतियाँ भी इसी नाम से प्रसिद्ध हुईं। अपने नामकरण की चर्चा करते हुए स्वयं अमरकांत ने लिखा है कि-


"मेरे खानदान के लोग अपने नाम के साथ 'लाल' लगाते थे। मेरा नाम भी श्रीराम लाल ही था। लेकिन जब हम लोग बलिया शहर में रहने लगे तो चार-पाँच वर्ष बाद वहाँ अनेक कायस्थ परिवारों में 'लाल' के स्थान पर 'वर्मा` जोड़ दिया गया और मेरा नाम भी श्रीराम वर्मा हो गया।

परिवार

अमरकांत जी के परिवार के लोग मध्यम कोटि के काश्तकार थे। इनके बाबा गोपाल लाल मुहर्रिर थे। पिता सीताराम वर्मा ने इलाहाबाद में रहकर पढ़ाई की थी। यहीं की कायस्थ पाठशाला से उन्होंने इन्टरमीडिएट किया था। फिर उन्होंने मुख्तारी की परीक्षा पास की और बलिया कचहरी में प्रैक्टिस करने लगे थे। अमरकांत जी के पिताजी का सनातन धर्म में गहरा विश्वास था, किन्तु वे कर्मकांडो व धार्मिक रूढ़ियों में विश्वास नहीं करते थे। उनके आराध्य देवता थे- राम और शिव। वे उर्दू और फारसी के ज्ञाता थे। उन्हें हिन्दी का कामचलाऊ ज्ञान था। अमरकांत की एक बड़ी बहन गायत्री थीं, जो अमरकांत के बचपन में ही बीमारी से मर गई थी। अमरकांत को लेकर परिवार में सात भाई और एक बहन थी, जिन्हें पिता सीताराम वर्मा ने योग्य तरीके से पढ़ाया-लिखाया था।

शिक्षा

अमरकांत जी का 'नगरा` के प्राइमरी स्कूल में ही नाम लिखाया गया था। कुछ दिनों के बाद उनका परिवार बलिया शहर आ गया। यहाँ के तहसीली स्कूल में अमरकांत का नाम कक्षा 'एक` में लिखा दिया गया। यहाँ पर वे कक्षा 'दो` तक ही पढ़ पाये। बाद में उनका नाम 'गवर्नमेन्ट हाई स्कूल' में कक्षा 'तीन' में लिखाया लिया। यहाँ के प्रधानाध्यापक महावीर प्रसाद जी थे। 1938-1939 ई. में अमरकांत कक्षा आठ में थे, और इसी समय उनके विद्यालय में हिन्दी के नए शिक्षक के रूप में बाबू गणेश प्रसाद का आगमन हुआ। वे साहित्य के अच्छे जानकार थे और कभी-कभी निबंध की जगह कहानी लिखने को कहते थे। बच्चों को हस्तलिखित पत्रिका भी निकालने के लिए प्रेरित किया करते थे। सन 1946 ई. में अमरकांत ने बलिया के 'सतीशचन्द्र इन्टर कॉलेज' से इन्टरमीडियेट की पढ़ाई पूरी की और बी.ए. 'इलाहाबाद विश्वविद्यालय' से करने लगे।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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