राही मासूम रज़ा  

राही मासूम रज़ा
राही मासूम रज़ा
पूरा नाम राही मासूम रज़ा
जन्म 1 सितंबर, 1927
जन्म भूमि गाज़ीपुर
मृत्यु 15 मार्च, 1992
मृत्यु स्थान मुंबई
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र साहित्यकार
मुख्य रचनाएँ 'टोपी शुक्ला', 'ओस की बूंद', 'हिम्मत जौनपुरी' आदि।
भाषा हिन्दी, उर्दू
विद्यालय अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय
शिक्षा एम.ए., पी.एच.डी
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी राही मासूम रज़ा ने प्रसिद्ध टीवी सीरियल 'महाभारत' की पटकथा लिखी थी। 1979 में 'मैं तुलसी तेरे आँगन की' फ़िल्म के लिए उन्होंने 'फ़िल्म फ़ेयर सर्वश्रेष्ठ संवाद पुरस्कार' भी जीता था।
इन्हें भी देखें कवि सूची, साहित्यकार सूची

राही मासूम रज़ा (अंग्रेज़ी: Rahi Masoom Raza, जन्म: 1 सितंबर, 1927, ग़ाज़ीपुर; निधन: 15 मार्च, 1992, मुंबई) बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी एवं प्रसिद्ध साहित्यकार थे। बी. आर. चोपड़ा द्वारा निर्मित प्रसिद्ध टीवी सीरियल महाभारत की पटकथा भी उन्होंने लिखी थी और 1979 में 'मैं तुलसी तेरे आँगन की' फ़िल्म के लिए फ़िल्म फ़ेयर सर्वश्रेष्ठ संवाद पुरस्कार भी जीता। उर्दू शायरी से अपनी रचना यात्रा आरंभ करने वाले राही मासूम रज़ा ने पहली कृति 'छोटे आदमी की बड़ी कहानी' लिखी थी, जो 1965 के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए वीर अब्दुल हमीद की जीवनी पर आधारित है।

जीवन परिचय

राही का जन्म एक सम्पन्न एवं सुशिक्षित शिया परिवार में हुआ। राही के पिता गाजीपुर की ज़िला कचहरी में वकालत करते थे।

शिक्षा

राही की प्रारम्भिक शिक्षा ग़ाज़ीपुर में हुई, बचपन में पैर में पोलियो हो जाने के कारण उनकी पढ़ाई कुछ सालों के लिए छूट गयी, लेकिन इंटरमीडियट करने के बाद वह अलीगढ़ आ गये और उच्च शिक्षा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में हुई। जहाँ उन्होंने 1960 में एम.ए. की उपाधि विशेष सम्मान के साथ प्राप्त की। 1964 में उन्होंने अपने शोधप्रबन्ध तिलिस्म-ए-होशरुबा में भारतीय सभ्यता और संस्कृति विषय पर पी.एच.डी करने के बाद राही ने दो वर्ष अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में अध्यापन किया और अलीगढ़ के ही एक मुहल्ले 'बदरबाग' में रहने लगे। यहीं रहते हुए उन्होंने आधा गाँव, दिल एक सादा काग़ज़, ओस की बूंद, हिम्मत जौनपुरी, उपन्यास व 1965 के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए 'वीर अब्दुल हामिद' की जीवनी छोटे आदमी की बड़ी कहानी लिखी। उनकी ये सभी रचनाएँ हिंदी में थीं।

साम्यवादी दृष्टिकोण

अलीगढ़ में राही के भीतर साम्यवादी दृष्टिकोण का विकास हुआ और वह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य भी बन गये। अपने व्यक्तित्व के इस समय में वे बड़े ही उत्साह से साम्यवादी सिद्धान्तों से समाज के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए वे प्रयत्नशील रहे। परिस्थितिवश उन्हें अध्यापन कार्य छोड़ना पड़ा और वे रोज़ी-रोटी की तलाश में मुंबई पहुंच गये।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

बाहरी कड़ियाँ

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