शरत चंद्र चट्टोपाध्याय  

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय
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पूरा नाम शरत चंद्र चट्टोपाध्याय
जन्म 15 सितम्बर सन् 1876 ई.
जन्म भूमि देवानंदपुर, पश्चिम बंगाल
मृत्यु 16 जनवरी सन् 1938 ई.
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र साहित्य
मुख्य रचनाएँ 'देवदास', 'चरित्रहीन', 'श्रीकान्त', 'दर्पचूर्ण', 'पंडित मोशाय' आदि।
विषय सामाजिक
भाषा हिन्दी, बांग्ला
प्रसिद्धि बांग्ला उपन्यासकार
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी शरतचंद्र के कुछ उपन्यासों पर आधारित हिन्दी फ़िल्में भी कई बार बनी हैं। 1974 में इनके उपन्यास 'चरित्रहीन' पर आधारित फ़िल्म बनी थी। उसके बाद देवदास को आधार बनाकर देवदास फ़िल्म का निर्माण तीन बार हो चुका है।
इन्हें भी देखें कवि सूची, साहित्यकार सूची

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय (अंग्रेज़ी: Sarat Chandra Chattopadhyay, जन्म: 15 सितम्बर, सन् 1876; मृत्यु: 16 जनवरी, सन् 1938) बांग्ला के अमर कथाशिल्पी और सुप्रसिद्ध उपन्यासकार थे। इनका जन्म 15 सितम्बर सन् 1876 ई. को हुगली ज़िले के एक देवानंदपुर गाँव में हुआ था। शरतचंद्र अपने माता-पिता की नौ संतानों में एक थे। शरतचंद्र ने अठ्ठारह साल की उम्र में बारहवीं पास की थी। शरतचंद्र ने इन्हीं दिनों 'बासा' (घर) नाम से एक उपन्यास लिख डाला, पर यह रचना प्रकाशित नहीं हुई।[1] कॉलेज की पढ़ाई को बीच में ही छोड़कर वे तीस रुपए मासिक के क्लर्क होकर बर्मा (वर्तमान म्यांमार) पहुँच गए। शरत चंद्र चट्टोपाध्याय की कथा-साहित्य की प्रस्तुति जिस रूप-स्वरूप में हुई, लोकप्रियता के तत्त्व ने उनके पाठकीय आस्वाद में वृद्धि ही की है। शरत चंद्र चट्टोपाध्याय अकेले ऐसे भारतीय कथाकार भी हैं, जिनकी अधिकांश कालजयी कृतियों पर फ़िल्में बनीं तथा अनेक धारावाहिक सीरियल भी बने। इनकी कृतियाँ देवदास, चरित्रहीन और श्रीकान्त के साथ तो यह बार-बार घटित हुआ है।

साहित्यिक परिचय

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय यथार्थवाद को लेकर साहित्य क्षेत्र में उतरे थे। यह लगभग बंगला साहित्य में नई चीज़ थी। शरत चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने लोकप्रिय उपन्यासों एवं कहानियों में सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार किया था, पिटी-पिटाई लीक से हटकर सोचने को बाध्य किया था।

प्रतिभा

शरतचंद्र की प्रतिभा उपन्यासों के साथ-साथ उनकी कहानियों में भी देखने योग्य है। उनकी कहानियों में भी उपन्यासों की तरह मध्यवर्गीय समाज का यथार्थ चित्र अंकित है। शरतचंद्र प्रेम कुशल के चितेरे थे। शरतचंद्र की कहानियों में प्रेम एवं स्त्री-पुरुष संबंधों का सशक्त चित्रण हुआ है। इनकी कुछ कहानियाँ कला की दृष्टि से बहुत ही मार्मिक हैं। ये कहानियाँ शरत के हृदय की सम्पूर्ण भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। उन्होंने कहानियाँ अपने बालपन के संस्मरण से और अपने संपर्क में आये मित्र व अन्य जन के जीवन से उठाई हैं। ये कहानियाँ जैसे हमारे जीवन का एक हिस्सा है ऐसा प्रतीत होता है।

महात्मा गाँधी का कथन

महात्मा गांधी ने कहा था- "पाप से घृणा करो, पापी से नहीं।" विश्वविख्यात बांग्ला कथाशिल्पी शरत चंद्र चट्टोपाध्याय ने गांधी जी के उपरोक्त कथन को अपने साहित्य में उतारा था। उन्होंने पतिता, कुलटा, पीड़ित दहबी-कुचली और प्रताड़ित नारी की पीड़ा को अपनी रचनाओं में स्वर दिया।[2]

हृदय के सच्चे पारख़ी

शरतचंद्र के मन में नारियों के प्रति बहुत सम्मान था वे नारी हृदय के सच्चे पारख़ी थे। उनकी कहानियों में स्त्री के रहस्यमय चरित्र, उसकी कोमल भावनाओं, दमित इच्छाओं, अपूर्ण आशाओं, अतृप्त आकांक्षाओं, उसके छोटे-छोटे सपनों, छोटी-बड़ी मन की उलझनों और उसकी महत्त्वकांक्षाओं का जैसा सूक्ष्म, सच्चा और मनोवैज्ञानिक चित्रण-विश्लेषण हुआ है, वह अन्यत्र दुर्लभ है।[2]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. शरत चंद्र चट्टोपाध्याय (हिन्दी) हिन्दी। अभिगमन तिथि: 13 सितंबर, 2010
  2. 2.0 2.1 2.2 प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश (हिन्दी) भारतीय साहित्य संग्रह। अभिगमन तिथि: 13 सितंबर, 2010
  3. शरतचंद्र चट्टोपाध्याय (हिन्दी) भारतीय साहित्य संग्रह। अभिगमन तिथि: 13 सितंबर, 2010

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