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भुवनेश्वर (साहित्यकार) - भारतकोश, ज्ञान का हिन्दी महासागर

भुवनेश्वर (साहित्यकार)  

भुवनेश्वर (साहित्यकार)
भुवनेश्वर
पूरा नाम भुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव
जन्म 1910
जन्म भूमि शाहजहांपुर, उत्तर प्रदेश
मृत्यु 1957
मृत्यु स्थान लखनऊ, उत्तर प्रदेश
कर्म-क्षेत्र एकांकीकार, कहानीकार, आलोचक, कवि
मुख्य रचनाएँ श्यामा : एक वैवाहिक विडंबना, एक साम्यहीन साम्यवादी, प्रतिभा का विवाह (सभी एकांकी), भेड़िये, ‘मौसी’, ‘लड़ाई’, ‘माँ बेटे’, ‘मास्टनी’ (सभी कहानी) आदि
भाषा हिंदी
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी प्रेमचंद ने भुवनेश्वर को भविष्य का रचनाकार माना था। इसकी एक ख़ास वजह थी कि भुवनेश्वर अपने रचनाकाल से बहुत आगे की सोच के रचनाकार थे।
इन्हें भी देखें कवि सूची, साहित्यकार सूची
Disamb2.jpg भुवनेश्वर एक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- भुवनेश्वर (बहुविकल्पी)

भुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव (अंग्रेज़ी:Bhuvaneshvar Prasad Shrivastava, जन्म: 1910 - मृत्यु: 1957) हिंदी के प्रसिद्ध एकांकीकार, लेखक एवं कवि थे। भुवनेश्वर साहित्य जगत् का ऐसा नाम है, जिसने अपने छोटे से जीवन काल में लीक से अलग किस्म का साहित्य सृजन किया। भुवनेश्वर ने मध्य वर्ग की विडंबनाओं को कटु सत्य के प्रतीरूप में उकेरा। उन्हें आधुनिक एकांकियों के जनक होने का गौरव भी हासिल है। एकांकी, कहानी, कविता, समीक्षा जैसी कई विधाओं में भुवनेश्वर ने साहित्य को नए तेवर वाली रचनाएं दीं। एक ऐसा साहित्यकार जिसने अपनी रचनाओं से आधुनिक संवेदनाओं की नई परिपाटी विकसित की। प्रेमचंद जैसे साहित्यकार ने उनको भविष्य का रचनाकार माना था। इसकी एक ख़ास वजह यह थी कि भुवनेश्वर अपने रचनाकाल से बहुत आगे की सोच के रचनाकार थे। उनकी रचनायों में कलातीतता का बोध है, परन्तु आश्चर्यजनक रूप से यह भूतकाल से न जुड़ कर भविष्य के साथ ज्यादा प्रासंगिक नज़र आती हैं। ‘कारवां’ की भूमिका में स्वयं भुवनेश्वर ने लिखा है कि ‘विवेक और तर्क तीसरी श्रेणी के कलाकारों के चोर दरवाज़े हैं”। उनका यह मानना उनकी रचनाओं में स्पष्टतया द्रष्टिगोचर भी होता भी है। इंसान को वस्तु में बदलते जाने की जो तस्वीर उन्होंने उकेरी, वो आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है।

जीवन परिचय

भुवनेश्वर का जन्म शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश) के केरुगंज (खोया मंडी) में, 1910 में एक खाते-पीते परिवार में हुआ था। परन्तु बचपन में ही माँ की मौत से अचानक परिस्थितियां उनके विपरीत हो गई। इंटरमीडिएट का ये विद्यार्थी शाहजहांपुर को अलविदा करके इलाहाबाद चला गया। उस समय के भुवनेश्वर का बौद्धिक ज्ञान, हिन्दी-अंग्रेजी भाषाओं पर समान अधिकार, इंसानी रिश्तों को समझने का अदभुत नजरिया समकालीन लेखकों के लिए अचरज से कम नहीं था। परन्तु व्यक्तिगत रूप से स्वयं भुवनेश्वर का जीवन आभावों एवं कठिनताओं का पुलिंदा था। इलाहाबाद, बनारस, लखनऊ में भटकते भुवनेश्वर के लिए मित्र मंडली के घर आसरा, और कठिनाइयों का चोली दामन का साथ रहा। परन्तु इन परेशानियों में भी उनकी साहित्य यात्रा अनवरत जारी रही। एक बार स्वयं प्रेमचंद ने उनसे अपने लेखन में ‘कटुता’ कम करने की राय दी थी, जिस पर उन्होंने कहा कि इस ‘कटुता’ की उपज के पीछे के कारणों की भी पड़ताल होनी चाहिये। शायद यही कारण, वो तमाम विसंगतियां थी, जिनका सामना उन्हें अपने जीवन में करना पड़ा। 1957 में लखनऊ स्टेशन पर भुवनेश्वर ने दुनिया को अलविदा कह दिया।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. पुस्तक- हिंदी साहित्य कोश-2 | सम्पादक- धीरेंद्र वर्मा | पृष्ठ- 414

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