नाटक  

नाटक रंगमंच से जुड़ी एक विधा है, जिसे अभिनय करने वाले कलाकारों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। नाटक की परम्परा बहुत प्राचीन है। यह अपने जन्म से ही शब्द की कला के साथ-साथ अभिनय की महत्त्वपूर्ण कला भी रहा है। अभिनय रंगमंच पर किया जाता है। रंगमंच पर नाटक के प्रस्तुतीकरण के लिए लेखक के शब्दों के अतिरिक्त, निर्देशक, अभिनेता, मंच-व्यवस्थापक और दर्शक की भी आवश्यकता होती है। नाटक के शब्दों के साथ जब इन सबका सहयोग घटित होता है, तब नाट्यानुभूति या रंगानुभूति पैदा होती है।

इतिहास

पाणिनी ने नाटक की उत्पत्ति 'नट्' धातु से मानी है।[1] और रामचन्द्र गुणचन्द्र ने 'नाट्यदर्पण' में इसका उद्भव 'नाट्' धातु से माना है।[2] वेबर और मोनियर बिलियम्स का मत है कि 'नट्' धातु 'नृत्' धातु का प्राकृत रूप है। माकण्ड का मत है कि 'नृत्' बहुत प्राचीन है और 'नट्' का प्रचलन अपेक्षाकृत कम पुराना है। किसी-किसी का मत है कि 'नट्' और 'नृत्' दोनों धातुएँ ऋग्वेदिक काल से ही प्रचलित है। दोनों का प्रयोग स्वतंत्र और एवं निरपेक्ष रूप से होता आया है। सायण ने अपने भाष्यों में 'नट्' का अर्थ 'व्याप्नोति' किया है[3] और 'नृत्' का गात्रविक्षेपण[4] ऐसा प्रतीत होता है कि वेदोत्तर काल में दोनों धातुएँ समानार्थक होती गईं, किंतु कालांतर में 'नट्' धातु का अर्थ अधिक व्यापक बन गया और 'नृत्' के अर्थ के साथ-साथ अभिनय का अर्थ इससे सिमटता चला गया।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. पाणिनी, 4।3।129
  2. ना. द.-गायकवाड़ ओरिएण्टल सीरीज, पृष्ठ 28
  3. 4।105।23
  4. 10।83
  5. 5.0 5.1 नाटक क्या है (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 5 मार्च, 2013।

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