टी. बी. कुन्हा  

टी. बी. कुन्हा
टी. बी. कुन्हा
पूरा नाम टी. बी. कुन्हा
जन्म 2 अप्रैल, 1891
जन्म भूमि गोवा
मृत्यु 26 सितंबर, 1958
नागरिकता भारतीय
प्रसिद्धि स्वतंत्रता सेनानी
जेल यात्रा 24 जुलाई, 1948 को डॉ. कुन्हा को गिरफ्तार किया गया और आठ वर्ष की सजा हुई।
शिक्षा बी.ए. (पांडिचेरी से) और इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग (पेरिस से)
विशेष योगदान अंग्रेज़ों ने जलियाँवाला बाग़ में घटित हत्याकांड के जो समाचार पश्चिमी देशों से छिपाये, उन्हें पूरे यूरोप के पत्रों में प्रकाशित कराने का श्रेय डॉ. कुन्हा को ही जाता है।
अन्य जानकारी 1953 में भारत वापस आने के बाद टी. बी. कुन्हा ने मुंबई में ‘गोवा एक्शन कमेटी’ का गठन किया। इसके प्रचार से ही 1954 में दादरा एवं नगर हवेली ज़िलों में पुर्तग़ाल की सत्ता समाप्त हो गई।

टी. बी. कुन्हा (अंग्रेज़ी: T. B. Cunha; जन्म- 2 अप्रैल, 1891, गोवा, मृत्यु- 26 सितंबर, 1958) गोवा के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी थे। ये ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने अपना सब कुछ न्योछावर करके गोवा को स्वतंत्र कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। डॉ. टी. बी. कुन्हा जैसे अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने अपार कष्ट सह कर गोवा को 1961 में स्वतंत्रता दिलाई। आधुनिक भारत के यशस्वी सपूत टी. बी. कुन्हा "गोवा के जनक" के रूप में माने जाते हैं। वे एक दूरदृष्टा राष्ट्रवादी स्वतंत्रता सेनानी थे।

जन्म तथा शिक्षा

टी. बी. कुन्हा का जन्म 2 अप्रैल, 1891 ई. को गोवा के चंदौर नामक गांव में हुआ था। इन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पणजी से प्राप्त की थी, लेकिन यहाँ की शिक्षा-व्यवस्था से संतुष्ट न होकर कुन्हा पांडिचेरी चले गए। वहाँ से उन्होंने बी. ए. उत्तीर्ण किया और फिर पेरिस चले गए। पेरिस से कुन्हा जी ने इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में उच्च शिक्षा प्राप्त की। वहीं उन्होंने 1916 से 1926 तक एक निजी फर्म में काम किया।

पत्रों में लेखन कार्य

इस बीच डॉ. कुन्हा रोमां रोलां जैसे प्रसिद्ध विचारकों के संपर्क में आए। वर्ष 1917 की रूसी राज्य-क्रांति का भी टी. बी. कुन्हा के विचारों पर प्रभाव पड़ा। वे अनुभव करने लगे कि पश्चिमी देशों का साम्राज्यवादी नियंत्रण समाप्त होना चाहिए। उन्होंने फ्रांस के पत्रों में लेख लिखकर लोगों को भारत में अंग्रेजों के द्वारा किए जा रहे शोषण से परिचित कराया। ब्रिटिश सरकार ने जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड के जो समाचार पश्चिमी देशों से छिपा रखे थे, उन्हें पूरे विवरण के साथ यूरोप के पत्रों में प्रकाशित कराने का श्रेय डॉ. कुन्हा को ही जाता है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ


लीलाधर, शर्मा भारतीय चरित कोश (हिन्दी)। भारतडिस्कवरी पुस्तकालय: शिक्षा भारती, 344 से 345।

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