केसरी सिंह बारहट  

केसरी सिंह बारहट
केसरी सिंह बारहट
पूरा नाम केसरी सिंह बारहट
जन्म 21 नवम्बर, 1872
जन्म भूमि देवपुरा, शाहपुरा, राजस्थान
मृत्यु 14 अगस्त, 1941
अभिभावक कृष्ण सिंह बारहट
संतान प्रताप सिंह बारहट
नागरिकता भारतीय
प्रसिद्धि कवि तथा स्वतन्त्रता सेनानी
धर्म हिन्दू
जेल यात्रा 1914
विशेष केसरी सिंह बारहट का नाम कितना प्रसिद्ध था, उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उस समय के श्रेष्ठ नेता लोकमान्य तिलक ने अमृतसर में हुए 'कांग्रेस अधिवेशन' में उन्हें जेल से छुड़ाने का प्रस्ताव पेश किया था।
अन्य जानकारी सन 1920-21 में वर्धा में केसरी जी के नाम से 'राजस्थान केसरी' नामक साप्ताहिक समाचार पत्र शुरू किया गया था, जिसके संपादक विजय सिंह पथिक थे। वर्धा में ही उनका महात्मा गाँधी से घनिष्ठ संपर्क हुआ।

केसरी सिंह बारहट (अंग्रेज़ी: Kesari Singh Barahath ; जन्म- 21 नवम्बर, 1872, शाहपुरा, राजस्थान; मृत्यु- 14 अगस्त, 1941) प्रसिद्ध राजस्थानी कवि और स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने बांग्ला, मराठी, गुजराती आदि भाषाओं के साथ इतिहास, दर्शन[1], मनोविज्ञान, खगोलशास्त्र तथा ज्योतिष आदि का अध्ययन कर प्रमाणिक विद्वत्ता हासिल कर ली थी। केसरी जी के भाई जोरावर सिंह बारहट और पुत्र प्रताप सिंह बारहट ने रास बिहारी बोस के साथ लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय की सवारी पर बम फेंकने के कार्य में भाग लिया था। केसरी सिंह बारहट ने प्रसिद्ध 'चेतावनी रा चुंग्ट्या' नामक सोरठे रचे थे, जिन्हें पढ़कर मेवाड़ के महाराणा अत्यधिक प्रभावित हुए थे और वे 1903 ई. में लॉर्ड कर्ज़न द्वारा आयोजित 'दिल्ली दरबार' में शामिल नहीं हुए थे।

जन्म

केसरी सिंह बारहट का जन्म 21 नवम्बर, 1872 ई. में देवपुरा रियासत, शाहपुरा, राजस्थान में हुआ था। इनके पिता का नाम कृष्ण सिंह बारहट था। जब केसरी सिंह मात्र एक माह के ही थे, तभी उनकी माता का निधन हो गया। अतः उनका लालन-पालन उनकी दादी माँ ने किया।

शिक्षा

केसरी जी की शिक्षा उदयपुर में हुई। उन्होंने बांग्ला, मराठी, गुजराती आदि भाषाओं के साथ इतिहास, दर्शन, मनोविज्ञान, खगोलशास्त्र तथा ज्योतिष आदि का अध्ययन कर प्रमाणिक विद्वत्ता हासिल कर ली थी। डिंगल-पिंगल भाषा की काव्य-सर्जना तो उनके जन्मजात चारण-संस्कारों में शामिल थी ही। बनारस से गोपीनाथ जी नाम के पंडित को बुलाकर इन्हें संस्कृत की शिक्षा भी दिलवाई गई। केसरी सिंह बारहट के स्वाध्याय के लिए उनके पिता कृष्ण सिंह का प्रसिद्ध पुस्तकालय 'कृष्ण-वाणी-विलास' भी उपलब्ध था।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. भारतीय और यूरोपीय

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