बली राम भगत  

बली राम भगत
बली राम भगत
पूरा नाम बली राम भगत
जन्म 7 अक्टूबर, 1922
जन्म भूमि पटना, बिहार
मृत्यु 2 जनवरी, 2011
पति/पत्नी विद्या भगत
नागरिकता भारतीय
पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
पद लोकसभा अध्यक्ष, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल
कार्य काल लोकसभा अध्यक्ष- 15 जनवरी, 1976 - 25 मार्च, 1977

राज्यपाल (हिमाचल प्रदेश)- 11 फ़रवरी, 1993 - 29 जून, 1993 राज्यपाल (राजस्थान)- 30 जून, 1993 - 1 मई, 1998

शिक्षा एम. ए. (अर्थशास्त्र)
विद्यालय पटना विश्वविद्यालय
अन्य जानकारी बली राम भगत ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर "नॉन-एलाइनमेंटः प्रेजेंट एंड फ्यूचर" तथा "कॉमनवेल्थ टुडे" नामक दो पुस्तकें भी लिखीं।

बली राम भगत (अंग्रेज़ी: Bali Ram Bhagat, जन्म: 7 अक्टूबर, 1922; मृत्यु: 2 जनवरी, 2011) प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, संसदीय व्यवस्था के गहन अनुभवी तथा संसदीय प्रक्रियाओं तथा कार्यसंचालन नियमों के अच्छे ज्ञाता जब 15 जनवरी, 1976 में पांचवीं लोकसभा के लोकसभा अध्यक्ष निर्वाचित किए गए, तब सभा का निर्धारित कार्यकाल समाप्त होने को था। भगत में अध्यक्ष पद के लिए अपेक्षित सभी योग्यताएं विद्यमान थीं। वे स्पष्टवादी, ईमानदार, दृढ़ और निष्पक्ष व्यक्ति थे। सभा तथा उसकी परम्पराओं में उनकी गहरी श्रद्धा थी। स्वतंत्रता के पश्चात् लोक सभा अध्यक्ष के रूप में भगत का चौदह मास से भी कम अवधि का कार्यकाल सबसे छोटा कार्यकाल था किन्तु इस संक्षिप्त अवधि में उन्होंने सदन की कार्यवाही पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। अध्यक्ष पद पर रहने के बाद राज्यपाल के रूप में उन्होंने जिस प्रकार कार्य किया, उससे यह सिद्ध हो गया कि वे सहज रूप से एक योग्य और प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति हैं। विभिन्न राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उन्होंने अपनी योग्यता का परिचय दिया।

जीवन परिचय

पेशे से एक कृषक, राजनीतिक एवं सामाजिक कार्यकर्ता, बली राम भगत का जन्म 7 अक्तूबर, 1922 को पटना, बिहार में हुआ था। उन्होंने स्नातक की शिक्षा पटना कॉलेज से प्राप्त की और बाद में पटना विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र निष्णात उपाधि प्राप्त की। भगत की राजनीति के प्रति प्रबल रुचि और उनकी प्रगाढ़ देशभक्ति उन्हें विद्यार्थी जीवन में ही स्वतंत्रता संग्राम की ओर मोड़ दिया। 1939 में 17 वर्ष की अल्पायु में ही, वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए और उन्होंने पार्टी द्वारा देश को विदेशी शासन से मुक्त कराने के लिए शुरू किए गए कई संघर्षों में भाग लिया। सन 1942 में, भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग लेने के लिए उन्होंने कॉलेज की पढ़ाई छोड़ दी और दो वर्ष तक भूमिगत रहे। वह सन् 1944 में अखिल भारतीय विद्यार्थी कांग्रेस के संस्थापक सदस्य और 1946-47 के दौरान बिहार प्रदेश विद्यार्थी कांग्रेस के महासचिव भी रहे।

टीका टिप्पणी और संदर्भ


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