ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान  

ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान
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पूरा नाम ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान
अन्य नाम 'सीमांत गांधी', 'बाचा ख़ान', 'बादशाह ख़ान'
जन्म 6 फ़रवरी, 1890 ई.
जन्म भूमि उतमंजाई, भारत (आज़ादी से पूर्व)
मृत्यु 20 जनवरी, 1988 ई.
मृत्यु स्थान पेशावर, पाकिस्तान
अभिभावक अब्दुल्ला ख़ान (परदादा), बैरम ख़ान (पिता)
नागरिकता भारतीय
पार्टी कांग्रेस
विद्यालय मिशनरी स्कूल
जेल यात्रा 1919 ई., 1930 ई. और 1942 ई. में जेल यात्रा की।
पुरस्कार-उपाधि भारत रत्न
रचना 'माई लाइफ़ ऐंड स्ट्रगल'
अन्य जानकारी गांधी जी के कट्टर अनुयायी होने के कारण ही उनकी 'सीमांत गांधी' की छवि बनी। विनम्र ग़फ़्फ़ार ने सदैव स्वयं को एक 'स्वतंत्रता संघर्ष का सैनिक' मात्र कहा, परन्तु उनके प्रसंशकों ने उन्हें 'बादशाह ख़ान' कह कर पुकारा।

ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान (अंग्रेज़ी: Khan Abdul Ghaffar Khan, जन्म: 6 फ़रवरी, 1890; मृत्यु: 20 जनवरी, 1988) महान् राजनेता थे, जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया और अपने कार्य और निष्ठा के कारण "सरहदी गांधी" (सीमान्त गांधी), "बाचा ख़ान" तथा "बादशाह ख़ान" के नाम से पुकारे जाने लगे। 20वीं शताब्दी में पख़्तूनों (या पठान; पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान का मुसममान जातीय समूह) के सबसे अग्रणी और करिश्माई नेता थे, जो महात्मा गांधी के अनुयायी बन गए और उन्हें ‘सीमांत गांधी’ कहा जाने लगा। अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ाँ का जन्म एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। वह बचपन से ही अत्यधिक दृढ़ स्वभाव के व्यक्ति हैं, इसलिये अफ़ग़ानों ने उन्हें 'बाचा ख़ान' के रूप में पुकारना प्रारम्भ कर दिया। आपका सीमा प्रान्त के क़बीलों पर अत्यधिक प्रभाव था। गांधी जी के कट्टर अनुयायी होने के कारण ही उनकी 'सीमांत गांधी' की छवि बनी। विनम्र ग़फ़्फ़ार ने सदैव स्वयं को एक 'स्वतंत्रता संघर्ष का सैनिक' मात्र कहा, परन्तु उनके प्रसंशकों ने उन्हें 'बादशाह ख़ान' कह कर पुकारा। गांधी जी भी उन्हें ऐसे ही सम्बोधित करते थे। राष्ट्रीय आन्दोलनों में भाग लेकर उन्होंने कई बार जेलों में घोर यातनायें झेली हैं। फिर भी वे अपनी मूल संस्कृति से विमुख नहीं हुए। इसी वज़ह से वह भारत के प्रति अत्यधिक स्नेह भाव रखते थे।

जीवन परिचय

ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान का जन्म 6 फ़रवरी, 1890 ई. को पेशावर, तत्कालीन ब्रिटिश भारत वर्तमान पाकिस्तान में हुआ था। उनके परदादा 'अब्दुल्ला ख़ान' बहुत ही सत्यवादी और जुझारू स्वभाव थे। उनके पिता 'बैरम ख़ान' शांत स्वभाव के थे और ईश्वरभक्ति में लीन रहा करते थे। उन्होंने अपने लड़के अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान को शिक्षित बनाने के लिए 'मिशनरी स्कूल' में भेजा, पठानों ने उनका बड़ा विरोध किया। मिशनरी स्कूल की पढ़ाई समाप्त करने के बाद वे अलीगढ़ आ गए। गर्मी की छुट्टियों में समाजसेवा करना उनका मुख्य काम था। शिक्षा समाप्त कर वह देशसेवा में लग गए।

सरहद के पार आज भी अपने लोगों की स्वाधीनता के लिए संघर्षरत 'सीमांत गांधी' के नाम से विख्यात ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ाँ प्रारम्भ से ही अंग्रेजों के ख़िलाफ़ थे।
ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान के साथ महात्मा गाँधी

टीका टिप्पणी और संदर्भ

बाहरी कड़ियाँ

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