भाई बालमुकुंद  

भाई बालमुकुंद
भाई बालमुकुंद
पूरा नाम भाई बालमुकुंद
जन्म 1889
जन्म भूमि करियाला, ज़िला जेहलम, पाकिस्तान (अविभाजित भारत)
मृत्यु 8 मई, 1915
मृत्यु स्थान चाँदनी चौक, दिल्ली
मृत्यु कारण फ़ाँसी
अभिभावक भाई मथुरादास
पति/पत्नी रामरखी
नागरिकता भारतीय
प्रसिद्धि स्वतंत्रता सेनानी
धर्म हिन्दू
विद्यालय डी.ए.वी. कॉलेज, लाहौर
शिक्षा स्नातक तथा बी.टी.सी.
विशेष 'दिल्ली षड़यंत्र' में भाई बालमुकुंद की भी मुख्य भूमिका थी। चाँदनी चौक में सन 1912 में भाई बालमुकुंद ने मास्टर अवधबिहारी तथा मास्टर अमीरचंद के साथ मिलकर अंग्रेज़ वाइसराय लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंका था, किंतु वह इस हमले में बाल-बाल बच गया।
अन्य जानकारी भाई बालमुकुंद का विवाह फ़ाँसी दिये जाने से एक साल पहले ही हुआ था। आज़ादी की लड़ाई में जुटे होने के कारण वे कुछ समय ही पत्नी के साथ रह सके थे।

भाई बालमुकुंद (अंग्रेज़ी: Bhai Balmukund, जन्म- 1889; शहादत- 8 मई, 1915, दिल्ली) भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले क्रांतिकारियों में से एक थे। 'दिल्ली षड़यंत्र' में फ़ाँसी पाने वाले प्रमुख क्रांतिकारियों में से वे एक थे। सन 1912 में दिल्ली के चाँदनी चौक में लॉर्ड हार्डिग पर फेंके गये बमकाण्ड में मास्टर अमीरचंद, भाई बालमुकुंद और मास्टर अवध बिहारी को 8 मई, 1915 को फ़ाँसी पर लटका दिया गया, जबकि अगले दिन 9 मई को अंबाला में वसंत कुमार विश्वास को फ़ाँसी दी गई। यद्यपि भाई बालमुकुंद पर जुर्म साबित नहीं हुआ था, फिर भी शक के आधार पर अंग्रेज़ हुकूमत ने उन्हें सज़ा दी। भाई बालमुकुंद महान् क्रान्तिकारी भाई परमानन्द के चचेरे भाई थे। दिल्ली में जिस स्थान पर बालमुकुंद को फ़ाँसी दी गई, वहाँ शहीद स्मारक बना दिया गया है, जो दिल्ली गेट स्थित 'मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज' में स्थित है।

परिचय

भाई बालमुकुंद का जन्म सन 1889 को करियाला, ज़िला जेहलम, पाकिस्तान में हुआ था। इनके पिता का नाम भाई मथुरादास था। भाई बालमुकुंद के खानदान में अपने सिद्धांतों पर मर मिटने की प्रथा बड़ी पुरानी थी। गुरु नानक के अनुयायी पहले शांति के पुजारी थे, पर जब मुग़लों ने उन्हें दबाना चाहा तो ये ही शांतिप्रिय शिष्य तलवार उठाने पर विवश हुए। यह एक बहुत बड़ा‌‌‌ परिवर्तन था। इस परिवर्तन के पीछे भाई बालमुकुंद के पूर्वपुरुषों का बहुत बड़ा‌ योग था। इसी कुल में मतिदास हुए, जो गुरु तेग़ बहादुर के साथ शहीद हुए। उन्हें लकड़ी के दोशहतीरों के के बीच रखकर आरी से चीरा गया। इस बलिदान के कारण गुरु गोविंदसिंह ने इस कुल के लोगों को भाई की उपाधी दी थी। इसी त्याग-तपस्या से उज्ज्वल कुल में भाई बालमुकुंद का जन्म हुआ था। इनके चार भाई थे- जयरामदास, शिवराम, कृपाराम और रामभज। उनकी एकमात्र बहन द्रौपदी देवी, छोटी उम्र में विधवा हो जाने के कारण पिता के यहाँ ही रहती थीं।[1]

शिक्षा

बालमुकुंद लाहौर के डी.ए.वी. कॉलेज में पढ़कर स्नातक हुए और फिर उन्होंने शिक्षक बनने के उद्देश्य से बी.टी. की परीक्षा भी पास कर ली। 1910 के बी.टी.सी. उत्तीर्ण परीक्षार्थियों में उनका नंबर तीसरा था।

विवाह

भाई बालमुकुंद का विवाह फ़ाँसी दिये जाने से एक साल पहले ही हुआ था। आज़ादी की लड़ाई में जुटे होने के कारण वे कुछ समय ही पत्नी के साथ रह सके। उनकी पत्नी का नाम रामरखी था। उनकी इच्छा थी कि भाई बालमुकुंद का शव उन्हें सौंप दिया जाए, लेकिन अंग्रेज़ हुकूमत ने उन्हें शव नहीं दिया। उसी दिन से रामरखी ने भोजन व पानी त्याग दिया और अठारहवें दिन उनकी भी मृत्यु हो गई।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 भूले बिसरे क्रांतिकारी |लेखक: रामशरण विद्यार्थी, मन्मथनाथ गुप्त |प्रकाशक: सूचना और प्रकाशन मंत्रालय, भारत सरकार |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 79 |

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