अब्दुल हमीद कैसर  

Disamb2.jpg अब्दुल हमीद एक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- अब्दुल हमीद (बहुविकल्पी)
अब्दुल हमीद कैसर
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पूरा नाम सैयद मोहम्मद अब्दुल हमीद कैसर
अन्य नाम लखपति
जन्म 5 मई, 1929
जन्म भूमि झालावाड़, राजस्थान
मृत्यु 18 जुलाई, 1998
अभिभावक सैयद मीर मोहम्मद अली (पिता)
नागरिकता भारतीय
प्रसिद्धि प्रखरवक्ता, स्वतंत्रता सेनानी, ग़रीबों के मसीहा, त्यागी देशप्रेमी एवं देशभक्त
शिक्षा एम. एस. सी, एल. एल. बी., डी. एफ. ए.
अन्य जानकारी अब्दुल हमीद कैसर राजस्थान में अपने उपनाम 'लखपति' के नाम से ही प्रसिद्ध थे। वस्तुत: 1954 ई. में उनके नाम की एक लाख रुपये की लॉटरी खुली थी, उसके बाद से ही वे 'लखपति' के नाम से प्रसिद्ध हो गये।

अब्दुल हमीद कैसर (अंग्रेज़ी: Abdul Hamid Kaisar, जन्म- 5 मई, 1929, झालावाड़, राजस्थान; मृत्यु- 18 जुलाई, 1998) भारत के जाने-माने देशभक्तों में से थे। कैसर विलक्षण व्यक्तित्व के धनी थे। ग़रीबों के लिए इनके दिल में बहुत प्यार था। इनके मन में बचपन से ही देशभक्ति की भावना जाग उठी थी, क्योंकि जिस विद्यालय में ये शिक्षा ग्रहण करते थे, वहाँ छात्रों में अंग्रेज़ी हुकूमत के विरुद्ध संघर्ष करने की भावना भरी जाती थी।

जन्म

अब्दुल हमीद कैसर का जन्म 5 मई, 1929 ई. राजस्थान में झालावड़ ज़िले के एक छोटे से कस्बे बकानी में हुआ था। उनके पिता का नाम सैयद मीर मोहम्मद अली था। वे उस क्षेत्र के बहुत बड़े जागीरदार थे तथा रियासत काल में तहसीलदार जैसे बड़े ओहदे पर नियुक्त थे। श्री लखपति अपने चार-भाई बहनों में सबसे छोटे थे। उनका पूरा नाम सैयद मोहम्मद अब्दुल हमीद कैसर था। अब्दुल हमीद कैसर राजस्थान में अपने उपनाम 'लखपति' के नाम से ही प्रसिद्ध थे। वस्तुत: 1954 ई. में उनके नाम की एक लाख रुपये की लॉटरी खुली थी, उसके बाद से ही वे 'लखपति' के नाम से प्रसिद्ध हो गये।

माता-पिता का साथ

अब्दुल हमीद कैसर का बचपन बहुत कष्टमय ढ़ग से गुजरा। जब वे तीन वर्ष के थे, तब उनके पिता की मृत्यु हो गई। इसके बाद उनके पिता के रिश्तेदारों ने उनकी सम्पत्ति पर कब्ज़ा कर लिया। ऐसी विषम स्थिति में उनके परिवार के सदस्य उन्हें बकानी से बूँदी ले आये। उनका जीवन बचपन से ही संघर्ष एवं कष्टों से भरा हुआ था।

विद्यार्थी जीवन

अब्दुल हमीद कैसर ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा झालावाड़ एवं बूँदी में प्राप्त की। तत्पश्चात् अपने कोटा के हितकारी विद्यालय से 10वीं की परीक्षा दी। यह विद्यालय उस समय बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से जुड़ा हुआ था। 'लखपति' के सबसे घनिष्ट मित्र रामचन्द्र सक्सेना थे। अब्दुल हमीद कैसर एवं रामचंद्र सक्सेना दोनों साथ-साथ विद्यालय में पढ़ते थे। संयोग से बाल्यावस्था में दोनों एक- दूसरे के अजीज मित्र बन गये। मित्र भी ऐसे कि एक- दूसरे को प्राणों से ज़्यादा चाहते थे। खाना-पीना, उठना बैठना एवं घूमना सब कुछ साथ ही होता था। एक हिन्दू और दूसरा मुसलमान होते हुए भी ऐसा प्रतीत होता था, जैसे दोनों सगे भाई हों, एक प्राण दो शरीर हों। अब्दुल हमीद कैसर अलीगढ़ विश्वविद्यालय से इण्टरमिडियेट, बी.एससी. तथा भूगर्भ विज्ञान में एम.एससी, एल.एल. बी. और विदेश सेवा में डिप्लोमा डी. एफ. ए. करने के बाद बूँदी चले आये और यहाँ पर वकालत प्रारम्भ की। अब्दुल हमीद कैसर ने अलीगढ़ विश्वविद्यालय के तत्कालीन वाइस चांसलर एवं भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन के सान्निध्य में रह कर पढ़ाई पूरी की थी। अब्दुल हमीद कैसर ने बूँदी में अपनी वकालत प्रारम्भ की और कुछ ही समय में वे बूँदी के प्रसिद्ध वकीलों में से एक बन गये। उन्हें फ़ौजदारी मुकदमों को लड़ने में महारत हासिल थी।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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