जोगेशचंद्र चटर्जी  

जोगेशचंद्र चटर्जी
जोगेशचंद्र चटर्जी
पूरा नाम जोगेशचंद्र चटर्जी
जन्म 1895
जन्म भूमि गावदिया, ढाका ज़िला, बंगाल
मृत्यु 22 अप्रैल, 1969
नागरिकता भारतीय
प्रसिद्धि काकोरी कांड के प्रसिद्ध क्रांतिकारी थे।
धर्म हिंदू
आंदोलन भारत छोड़ो आन्दोलन
विशेष योगदान इन्होंने अपने 24 वर्ष के कारवास में ढाई वर्ष भूख हड़ताल में गुजारे, जिसमें सबसे लम्बी भूख हड़ताल 142 दिनों की थी।
अन्य जानकारी स्वतंत्रता के बाद जोगेशचंद्र चटर्जी कांग्रेस के टिकट पर राज्य सभा के सदस्य रहे।

जोगेशचंद्र चटर्जी (अंग्रेज़ी:Jogesh Chandra Chatterjee, जन्म- 1895 ; मृत्यु- 22 अप्रैल, 1969) काकोरी कांड के प्रसिद्ध क्रांतिकारी थे। जोगेशचंद्र चटर्जी अनुशीलन समिति की गतिविधियों से जुड़े थे। काकोरी काण्ड में गिरफ्तार कर इन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गयी। रिहा होने के बाद इन्होंने क्रातिकारी समाजवादी पार्टी नामक संगठन की स्थापना की। 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन के समय इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इन्होंने अपने 24 वर्ष के कारवास में ढाई वर्ष भूख हड़ताल में गुजारे जिसमें सबसे लम्बी भूख हड़ताल 142 दिनों की थी।

जीवन परिचय

जोगेशचंद्र चटर्जी का जन्म 1895 ई. में ढाका ज़िला बंगाल के गावदिया नामक गांव में हुआ था। उनके पिता खुलना ज़िले में व्यवसाय करते थे। जोगेश को शिक्षा प्राप्त करने के लिए कुमिल्ला भेजा गया था। यहीं पर उनका संपर्क प्रसिद्ध क्रांतिकारी संगठन ‘अनुशीलन समिति’ के नेता विपिन चटर्जी से हुआ और वे छोटी उम्र में ही क्रांति के रंग में रंग गए।[1]

आरम्भिक जीवन

पुलिस को जोगेशचंद्र चटर्जी की गतिविधियों पर संदेह हुआ तो 1916 में उन्हें गिरफ्तार करने का प्रयत्न किया गया, पर वे चुपचाप कोलकाता चले गए। फिर भी 9 अक्टूबर, 1916 को पुलिस ने उन्हें पकड़ ही लिया। गिरफ्तारी के बाद क्रांतिकारियों का रहस्य जानने के लिए उन पर अनेक अमानुषिक अत्याचार किए गए। बंगाल की पुलिस ऐसे अत्याचारों के लिए बहुत बदनाम थी। गुप्त अंगों में बिजली के झटके लगाना, जाड़े में बर्फ़ की सिल्लियों पर लिटाना, मुंह में मिर्चों भरा तोबड़ा बांधना, दोनों हाथों की हथेलियों को खाट के पाये के नीचे दबाना, नाख़ूनों में सुइयाँ चुभाना आदि ऐसे अत्याचार थे जो क्रांतिकारियों पर किए जाते थे। जोगेश बाबू के साथ भी यही सब हुआ। यहाँ तक की बाल्टी में मल-मूत्र मिलाकर उससे उन्हें नहला दिया गया, मल से भरे कमोड़ में उनका मुंह डाल दिया गया। इस सब के बाद भी पुलिस, दल की कोई बात उनके मुंह से नहीं निकलवा सकी। उन्हें जेल में बंद कर दिया गया। जेल से जोगेशचंद्र चटर्जी सितंबर, 1920 को ही बाहर आ सके।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 भारतीय चरित कोश |लेखक: लीलाधर शर्मा 'पर्वतीय' |प्रकाशक: शिक्षा भारती, मदरसा रोड, कश्मीरी गेट, दिल्ली |पृष्ठ संख्या: 330 |

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