अनुशीलन समिति  

अनुशीलन समिति (अंग्रेज़ी: Anushilan Samiti) औपनिवेशिक काल में भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बंगाल में बनाई गई अंग्रेज़ विरोधी क्रांतिकारी गुप्त संस्था थी। इस समिति का उद्देश्य 'वन्दे मातरम्' के प्रणेता और प्रख्यात बांग्ला उपन्यासकार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय के बताये गये मार्ग का 'अनुशीलन' करना था।

अनुशीलन का अर्थ

अनुशीलन का अर्थ है-

  1. चिंतन, मनन
  2. बार-बार किया जाने वाला अध्ययन या अभ्यास
  3. किसी ग्रन्थ तथ्य विषय के सब अंगों तथा उपांगों पर बहुत ही सूक्ष्म दृष्टि से विचार करना और उनसे परिचित होना।

स्थापना

सतीश चन्द्र बसु ने 24 मार्च, 1902 को अनुशीलन समिति की संस्थापना की थी। बंगाल में 20वीं शताब्दी के आरम्भ में ही क्रांतिकारियों ने संगठित होकर कार्य करना आरम्भ कर दिया था। सन 1902 में कोलकाता में अनुशीलन समिति के अन्तर्गत तीन समितियाँ कार्य कर रहीं थीं। इस अनुशीलन समिति की स्थापना कोलकाता के बैरिस्टर प्रमथ मित्र ने की थी। इन तीन समितियों में से पहली समिति प्रमथ मित्र की थी, दूसरी समिति का नेतृत्व सरला देवी नामक एक बंगाली महिला के हाथों में था तथा तीसरी के नेता अरविन्द घोष थे, जो उस समय उग्र राष्ट्रवाद के सबसे बड़े समर्थक थे।

अनुशीलन समिति का आरम्भ सन 1902 में अखाड़ों से हुआ। इसके दो प्रमुख रूप थे- 'ढाका अनुशीलन समिति' तथा 'युगान्तर'। यह बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक दिनों में समूचे बंगाल में कार्य कर रही थी। पहले कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) और उसके कुछ बाद में ढाका इसके दो ही प्रमुख गढ़ थे। इसका आरम्भ अखाड़ों से हुआ। बाद में इसकी गतिविधियों का प्रचार-प्रसार ग्रामीण क्षेत्रों सहित पूरे बंगाल में हो गया। इसके प्रभाव के कारण ही ब्रिटिश भारत की सरकार को बंग भंग का निर्णय वापस लेना पड़ा था।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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