आधुनिक भारत का इतिहास  

भारतीयों की फूट तथा विघटनकारी तत्त्वों के कारण अठारहवीं शताब्दी में भारत पर अंग्रेज़ों का प्रभुत्व जम गया। भारत के इतिहास में लगभग पहली बार ऐसा हुआ कि, इसके प्रशासन और भाग्य-निर्णय की डोर एक ऐसी विदेशी जाति के हाथों में चली गई, जिसकी मातृभूमि कई हज़ार मील दूर अवस्थित थी। इस तरह की पराधीनता भारत के लिए एक सर्वथा नया अनुभव थी, क्योंकि यों तो अतीत में भारत पर कई आक्रमण हुए थे, समय-समय पर भारतीय प्रदेश के कुछ भाग अस्थायी तौर पर विजेताओं के उपनिवेशों में शामिल हो गये थे, पर ऐसे अवसर कम ही आये थे, और उनकी अवधि भी अत्यल्प ही रही थी। भारत पर अंग्रेज़ों ने एक विदेशी की तरह शासन किया। ऐसे कम ही अंग्रेज़ शासक हुए, जिन्होंने भारत को अपना देश समझा और कल्याणकारी भावना से उत्प्रेरित होकर शासन किया। उन्होंने व्यापार और राजनीतिक साधनों के माध्यम से भारत का आर्थिक शोषण किया और धन-निकास की नीति अपनाकर देश को खोखला कर डाला। उन्होंने भारतीयों के नैतिक मनोबल पर सदैव आघात किया। इस काल के इतिहास के पन्ने इस बात को सिद्ध करते हैं कि, एक ओर जहाँ ब्रिटिश सत्ता के भारत में स्थापित हो जाने के बाद देश में घोर अन्धकारपूर्ण और निराशाजनक वातावरण स्थापित हो गया, वहीं दूसरी ओर देश को ग़ुलामी की ओर धकेल दिया गया।[1]

भारत का पतन

Blockquote-open.gif यह बात शुरू में ही साफ़ हो गई थी कि, सफलता अंग्रेज़ों के हाथ लगेगी, और उसके कारण स्पष्ट थे। वे राष्ट्रवाद में विश्वास रखते थे, जबकि भारत में न यह भावना थी, और न ही अनुशासन। युद्ध-कौशल तथा रणनीति में अंग्रेज़ भारतीयों की अपेक्षा कहीं आगे थे। भारतीय सैनिक निष्ठावान तो थे, पर इन्हें भी अपने राजा के प्रति पूर्ण ईमानदार और वफ़ादार नहीं कहा जा सकता। भारतीय इतिहास में न जाने कितने ही सहायकों और विश्वासपात्रों ने अपने ही राजाओं को धोखा दिया और उनके साथ विश्वासघात करके उन्हें मौत के घाट उतार दिया। इन्हीं सब बातों से भारतीयों का अपनी भूमि पर ही पतन हुआ। Blockquote-close.gif

भारत के प्रति इंग्लैण्ड की अधिकार लिप्सा की भावना बहुत पहले ही उभरने लगी थी, तथा अंग्रेज़ लोग भारत को अपने अधिकार की वस्तु और सब प्रकार से पतित देश मानने लगे। भारत का उपयोग इंग्लैण्ड के लिए करना उनका प्रमुख दृष्टिकोण बन गया था। अंग्रेज़ प्रशासन, न भारतीय जनता के प्रति सहानुभूति रखता था और न ही भारतवासियों के कल्याण के प्रति सजग था। इंग्लैण्ड में जो क़ानून या नियम भारत के सम्बन्ध में बनाये जाने लगे थे, उनके प्रति यह ब्रिटिश नीति बनी कि, भारत के हितों का इंग्लैण्ड के लिए सदैव बलिदान किया जाना चाहिए। अंग्रेज़ों की इस नीति के कारण भारत उत्तरोत्तर आर्थिक दृष्टि से निर्धन और सांस्कृतिक दृष्टि से हीन होता चला गया। भारत के पतन के सम्बन्ध में कई प्रसिद्ध व्यक्तियों ने अपने विचार रखे हैं, उनमें से कुछ इस प्रकार से हैं-

  • केशव चन्द्र सेन के अनुसार - "आज हम अपने चारों ओर जो देखते हैं, वह है एक गिरा हुआ राष्ट्र। एक ऐसा राष्ट्र, जिसकी प्राचीन महानता खण्डहरों में गड़ी हुई पड़ी है। उसका राष्ट्रीय साहित्य और विज्ञान, उसका अध्यात्म ज्ञान और दर्शन, उसका उद्योग और वाणिज्य, उसकी सामाजिक समृद्धि और गार्हस्थिक सादगी और मधुरता ऐसी है, जिसकी गिनती लगभग अतीत की वस्तुओं में की जाती है। जब हम आध्यात्मिक, सामाजिक और बौद्धिक दृष्टि से उजड़े हुए, शोकयुक्त और उदासीन दृश्य, जो हमारे सामने फैला हुआ है, का निरीक्षण करते हैं, तो हम व्यर्थ ही उसमें कालिदास के देश-कविता, विज्ञान और सभ्यता के देश को पहचानने का प्रयत्न करते हैं।"
  • डॉ. थ्योडोर के अनुसार - "प्रधानतः आर्थिक लाभ के लिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने ब्रिटिश राज्य की स्थापना की और उसका विस्तार किया।"
  • ताराचन्द्र के अनुसार - "सत्रहवीं शताब्दी में भारत का गौरव अपनी पराकाष्ठा पर था, और उसकी मध्युगीन संस्कृति अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई थी। परन्तु जैसे-जैसे एक के बाद एक शताब्दियाँ बीतीं, वैसे-वैसे यूरोपीय सभ्यता का सूर्य तेज़ी से आकाश के मध्य की ओर बढ़ने लगा और भारतीय गगन में अन्धकार छाने लगा। फलतः जल्दी ही देश पर अन्धेरा छा गया, और नैतिक पतन तथा राजनीतिक अराजकता की परछाइयाँ लम्बी होने लगीं।[1]

भारतीयों का विरोध

यह सही है कि, प्रशासन एवं यातायात तथा शिक्षा के क्षेत्र में भारतवासियों ने इस विदेशी शासन से अनेक तत्त्व ग्रहण किये, किन्तु इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि, अंग्रेज़ों ने अधिकाधिक अर्थोपार्जन करने की नीति का ही अनुशीलन किया। यही कारण था कि, जहाँ भारतीयों ने मुसलमानों के शासन को स्वीकार करके उसे भारतीय शासन के इतिहास में शामिल किया, वहीं उन्होंने अंग्रज़ों को अपना संप्रभु नहीं माना। हृदय की गहराइयों से उनके शासन को स्वीकार नहीं किया और प्रारम्भ से ही उनके प्रति अपना विरोध प्रकट किया। अंग्रेज़ कभी भी भारतीय न बन सके, सदैव विदेशी बने रहे और समय आने पर सब के सब स्वदेश चले गये। यह विदेशी शासन भारतीयों को क़तई स्वीकार नहीं था। बंगाल के 'सिराज' के काल से लेकर दिल्ली के बहादुरशाह द्वितीय के काल तक भारतीय विरोध जारी रहा था।

अंग्रेज़

भारत में व्यापारिक कोठियाँ खोलने के प्रयास के अन्तर्गत ही ब्रिटेन के सम्राट जेम्स प्रथम ने 1608 ई. में कैप्टन हॉकिन्स को अपने राजदूत के रूप में मुग़ल सम्राट जहाँगीर के दरबार में भेजा था। 1609 ई. में हॉकिन्स ने जहाँगीर से मिलकर सूरत में बसने की इजाजत माँगी, परन्तु पुर्तग़ालियों तथा सूरत के सौदाग़रों के विद्रोह के कारण उसे स्वीकृति नहीं मिली। हॉकिन्स फ़ारसी भाषा का बहुत अच्छा जानकार था। कैप्टन हॉकिन्स तीन वर्षों तक आगरा में रहा। जहाँगीर ने उससे प्रसन्न होकर उसे 400 का मनसब तथा जागीर प्रदान की। 1616 ई. में सम्राट जेम्स प्रथम ने सर टॉमस रो को अपना राजदूत बनाकर जहाँगीर के पास भेजा। टॉमस रो का एकमात्र उदेश्य था - 'व्यापारिक संधि करना'। यद्यपि उसका जहाँगीर से व्यापारिक समझौता नहीं हो सका, फिर भी उसे गुजरात के तत्कालीन सूबेदार 'ख़ुर्रम' (बाद में शाहजहाँ के नाम से प्रसिद्ध) से व्यापारिक कोठियों को खोलने के लिए फ़रमान प्राप्त हो गया। इस प्रकार अंग्रेज़ों के पैर एक बार जो भारत में जमे, वह 1947 ई. में देश के आज़ाद होने तक के बाद ही उखड़ सके।
ईस्ट इण्डिया कम्पनी की मुहर

ईस्ट इण्डिया कम्पनी

ईस्ट इण्डिया कम्पनी एक निजी व्यापारिक कम्पनी थी, जिसने 1600 ई. में शाही अधिकार पत्र द्वारा व्यापार करने का अधिकार प्राप्त कर लिया था। इसकी स्थापना 1600 ई. के अन्तिम दिन महारानी एलिजाबेथ प्रथम के एक घोषणापत्र द्वारा हुई थी। यह लन्दन के व्यापारियों की कम्पनी थी, जिसे पूर्व में व्यापार करने का एकाधिकार प्रदान किया गया। कम्पनी का मुख्य उद्देश्य भारत में व्यापार करना और धन कमाना था। 1708 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की प्रतिद्वन्दी कम्पनी 'न्यू कम्पनी' का 'ईस्ट इण्डिया कम्पनी' में विलय हो गया। परिणामस्वरूप 'द यूनाइटेड कम्पनी ऑफ़ मर्चेंट्स ऑफ़ इंग्लैण्ड ट्रेडिंग टू ईस्ट इंडीज' की स्थापना हुई। कम्पनी और उसके व्यापार की देख-रेख 'गर्वनर-इन-काउन्सिल' करती थी। इन्हें भी देखें: गवर्नर-जनरल, रेग्युलेटिंग एक्ट, साइमन कमीशन एवं पिट एक्ट

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 1.3 पाण्डेय, धनपति। आधुनिक भारत का इतिहास - भाग 1 (हिन्दी) मोतीलाल बनारसीदास पब्लिशर्स। अभिगमन तिथि: 2 अगस्त, 2011।
  2. (टी.जी.पी स्पीयर, 'ट्विलाइट आफ मुग़ल्स,' पृ.5)

संबंधित लेख


और पढ़ें

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः



"http://m.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=आधुनिक_भारत_का_इतिहास&oldid=598274" से लिया गया