ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार का युद्ध  

ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार का युद्ध यूरोप में 1740 ई. में शुरू हुआ और 1748 ई. तक चला। उस वर्ष 'एक्स-ला-चेपेल' की सन्धि से यह युद्ध समाप्त हो गया। इस युद्ध में इंग्लैण्ड और फ़्राँस ने दो विरोधी पक्षों का समर्थन किया और भारत में अंग्रेज़ों की ईस्ट इंडिया कम्पनी और फ़्राँसीसी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने कर्नाटक में एक-दूसरे के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया।

  • पांडिचेरी के फ़्राँसीसी गवर्नर डूप्ले ने फ़्राँसीसी हितों की रक्षा के निमित्त मद्रास (वर्तमान चेन्नई) की अंग्रेज़ों की बस्ती पर अधिकार कर लिया। मद्रास और पांडिचेरी दोनों कर्नाटक के नबाव अनवरुद्दीन के क्षेत्र में स्थित थे। नवाब की सेना ने अंग्रेज़ों की रक्षा के लिए जब मद्रास का घेरा डाला तो फ़्राँसीसी सेना ने उसे पीछे खदेड़ दिया। सेंट थोम की लड़ाई में नवाब की सेना पुन: पराजित हुई।[1]
  • यूरोप में 'एक्स-ला-चेपेल' की सन्धि के बाद शान्ति स्थापित हो गयी और उसके बाद इंग्लैण्ड और फ़्राँस ने एक-दूसरे के विजित क्षेत्रों को लौटा दिया। इसी आधार पर मद्रास अंग्रेज़ों को वापस मिल गया। लेकिन ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार के युद्ध के परिणामस्वरूप 'प्रथम आंग्ल-फ़्राँसीसी युद्ध' का, जिसे 'कर्नाटक युद्ध' भी कहा जाता है, इतिहास पर भारी प्रभाव पड़ा।
  • इस युद्ध का पहला परिणाम यह हुआ कि कर्नाटक के नवाब और उसके स्वामी हैदराबाद के निज़ाम की कमज़ोरी प्रकट हो गयी, जो अपने राज्य में बसे विदेशियों को अपनी सार्वभौम सत्ता का सम्मान करने तथा शांति बनाये रखने कि लिए मज़बूर नहीं कर सके।[1]
  • दूसरा परिणाम यह हुआ कि कर्नाटक के नवाब की अपेक्षाकृत बड़ी सेना को छोटी-सी फ़्राँसीसी सेना ने दो बार पराजित कर दिया। फ़्राँसीसी सेना में फ़्राँसीसी सैनिकों के साथ भारतीय सैनिक भी थे। इन पराजयों से प्रकट हो गया कि यूरोपीय ढंग से संगठित, प्रशिक्षित तथा शस्त्रों से सज्जित सेना भारतीय सेना से श्रेष्ठ होती है।
  • तीसरा, इस लड़ाई में फ़्राँसीसी और अंग्रेज़ दोनों सेनाओं में भारतीय सिपाहियों को भर्ती किया गया था और फ़्राँसीसियों ने तो भारतीय सिपाहियों का प्रयोग देशी रजवाड़ों की सेनाओं से लड़ने तक में किया था। इस सबक को अंग्रेज़ों ने भली-भाँति सीख लिया और बाद में भारतीय सिपाहियों की सहायता से ही भारत को विजय किया।[1]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 भारतीय इतिहास कोश |लेखक: सच्चिदानन्द भट्टाचार्य |प्रकाशक: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान |पृष्ठ संख्या: 48 |

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