जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन  

जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन
सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन
पूरा नाम सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन
जन्म 7 जनवरी, 1851
जन्म भूमि डब्लिन, आयरलैंड
मृत्यु 9 मार्च, 1941
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र इतिहासकार, अंग्रेज़ी साहित्यकार, अन्वेषक
भाषा अंग्रेज़ी
पुरस्कार-उपाधि ग्रियर्सन को सरकार की ओर से 1894 में सी.आई.ई. और 1912 में 'सर' की उपाधि दी गई।
प्रसिद्धि ग्रियर्सन की ख्याति का प्रधान स्तंभ लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ़ इंडिया है।
विशेष योगदान बुद्ध और अशोक की धर्मलिपि के बाद ग्रियर्सन कृत सर्वे 'लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ़ इंडिया' ही एक ऐसा पहला ग्रंथ है जिसमें दैनिक जीवन में बोली जानेवाली भाषाओं और बोलियों का दिग्दर्शन प्राप्त होता है।
अन्य जानकारी ग्रियर्सन को हिन्दी से अतिशय प्रेम था। इसीलिए इन्होंने 33 वर्ष तक पर्याप्त परिश्रम कर असंख्य व्यक्तियों से पत्राचार एवं सम्पर्क स्थापित करके भारतीय भाषाओं एवं बोलियों के विषय में भरसक प्रामाणिक आँकड़े और विवरण एकत्र किये।

सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन (अंग्रेज़ी: Sir George Abraham Grierson, जन्म: 7 जनवरी, 1851; मृत्यु: 9 मार्च, 1941) का भारतीय विद्याविशारदों में, विशेषत: भाषाविज्ञान के क्षेत्र में एवं लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ़ इंडिया के प्रणेता के रूप में अमर स्थान है। ग्राउस और बीम्स की भाँति वे भी 'इंडियन सिविल सर्विस' के कर्मचारी थे। उनका जन्म डब्लिन के निकट 7 जनवरी, 1851 को हुआ था। उनके पिता आयरलैंड में 'क्वींस प्रिंटर' थे। 1868 से डब्लिन में ही उन्होंने संस्कृत और हिंदुस्तानी का अध्ययन प्रारंभ कर दिया था। बीज़ (Bee's) स्कूल श्यूज़बरी, ट्रिनटी कॉलेज, डब्लिन और कैंब्रिज तथा हले (Halle) जर्मनी में शिक्षा ग्रहण कर 1853 में वे 'इंडियन सिविल सर्विस' के कर्मचारी के रूप में बंगाल आए और प्रारंभ से ही भारतीय आर्य तथा अन्य भारतीय भाषाओं के अध्ययन की ओर रुचि प्रकट की। 1880 में 'इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स', बिहार और 1869 तक पटना के 'ऐडिशनल कमिश्नर और औपियम एज़ेंट', बिहार के रूप में उन्होंने कार्य किया। सरकारी कामों से छुट्टी पाने के बाद वे अपना अतिरिक्त समय संस्कृत, प्राकृत, पुरानी हिंदी, बिहारी और बंगला भाषाओं और साहित्यों के अध्ययन में लगाते थे। जहाँ भी उनकी नियुक्ति होती थी वहीं की भाषा, बोली, साहित्य और लोकजीवन की ओर उनका ध्यान आकृष्ट होता था।

महत्त्वपूर्ण खोज कार्य

1873 और 1869 के कार्यकाल में ग्रियर्सन ने अपने महत्त्वपूर्ण खोज कार्य किए। उत्तरी बंगाल के लोकगीत, कविता और रंगपुर की बँगला बोली जर्नल ऑफ दि एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल[1] राजा गोपीचंद की कथा[2] मैथिली ग्रामर[3] सेवेन ग्रामर्स ऑफ दि डायलेक्ट्स ऑफ दि बिहारी लैंग्वेज इंट्रोडक्शन टु दि मैथिली लैंग्वेज; ए हैंड बुक टु दि कैथी कैरेक्टर, बिहार पेजेंट लाइफ, बीइग डेस्क्रिप्टिव कैटेलाग ऑफ दि सराउंडिंग्ज ऑफ दि वर्नाक्युलर्स, जर्नल ऑफ दि जर्मन ओरिएंटल सोसाइटी, कश्मीरी व्याकरण और कोश, कश्मीरी मैनुएल, पद्मावती का संपादन[4] महामहोपाध्याय सुधाकर द्विवेदी की सहकारिता में, बिहारी कृत सतसई[5] का संपादन, नोट्स ऑन तुलसीदास, दि माडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान[6] आदि उनकी कुछ महत्त्वपूर्ण रचनाएँ हैं।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. जर्नल ऑफ दि एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल, 1877, जिल्द 1 संख्या 3, पृ. 186-226 :
  2. जर्नल ऑफ दि एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल, 1858,जिल्द 1 संख्या 3, पृ.135-238
  3. 1880
  4. 1902
  5. लल्लूलाल कृत टीका सहित
  6. 1889
  7. 1851-1941
  8. लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ़ इण्डिया
  9. 2 भागों में
  10. जिनमें से कुछ भागों में विभक्त हैं

धीरेंद्र, वर्मा “भाग- 2 पर आधारित”, हिंदी साहित्य कोश (हिंदी), 165।

ग्रियर्सन, जार्ज अब्राहम (हिंदी)। । अभिगमन तिथि: 5 अक्टूबर, 2011।

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