ताना भगत आन्दोलन  

ताना भगत आन्दोलन की शुरुआत वर्ष 1914 ईं. में बिहार में हुई थी। यह आन्दोलन लगान की ऊँची दर तथा चौकीदारी कर के विरुद्ध किया गया था। इस आन्दोलन के प्रवर्तक 'जतरा भगत' थे, जिसे कभी बिरसा मुण्डा, कभी जमी तो कभी केसर बाबा के समतुल्य होने की बात कही गयी है। इसके अतिरिक्त इस आन्दोलन के अन्य नेताओं में बलराम भगत, गुरुरक्षितणी भगत आदि के नाम प्रमुख थे।

आन्दोलन की शुरुआत

'मुण्डा आन्दोलन' की समाप्ति के क़रीब 13 वर्ष बाद 'ताना भगत आन्दोलन' शुरू हुआ। यह ऐसा धार्मिक आन्दोलन था, जिसके राजनीतिक लक्ष्य थे। यह आदिवासी जनता को संगठित करने के लिए नये 'पंथ' के निर्माण का आन्दोलन था। इस मायने में यह बिरसा मुण्डा आन्दोलन का ही विस्तार था। मुक्ति-संघर्ष के क्रम में बिरसा मुण्डा ने जनजातीय पंथ की स्थापना के लिए सामुदायिकता के आदर्श और मानदंड निर्धरित किये थे।[1]

आदर्श तथा मानदण्ड

ताना भगत आन्दोलन में उन आदर्शों और मानदंडों के आधर पर जनजातीय पंथ को सुनिश्चित आकार प्रदान किया गया। बिरसा ने संघर्ष के दौरान शांतिमय और अहिंसक तरीके विकसित करने के प्रयास किये। ताना भगत आन्दोलन में अहिंसा को संषर्ष के अमोघ अस्त्र के रूप में स्वीकार किया गया। बिरसा आन्दोलन के तहत झारखंड में ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ संघर्ष का ऐसा स्वरूप विकसित हुआ, जिसको क्षेत्रीयता की सीमा में बांधा नहीं जा सकता था। इस आन्दोलन ने संगठन का ढांचा और मूल रणनीति में क्षेत्रीयता से मुक्त रह कर ऐसा आकार ग्रहण किया कि वह महात्मा गाँधी के नेतृत्व में जारी आज़ादी के 'भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन' का अविभाज्य अंग बन गया।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 झारखण्ड का इतिहास (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 04 मई, 2014।

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