पिट एक्ट  

पिट का इंडिया एक्ट विलियम पिट कनिष्ठ ने 1784 ई. में प्रस्तावित किया और इसे पास किया था। विलियम पिट उस समय इंग्लैण्ड का प्रधानमंत्री था। पिट एक्ट के प्रभाव से अब कोई भी लिफ़ाफ़ा या थैला कोर्ट ऑफ़ डाइरेक्टर्स की आज्ञा के बिना भारत नहीं भेजा जा सकता था। बाद के कुछ दिनों में पिट एक्ट में संशोधन करके गवर्नर-जनरल को यह अधिकार दे दिया गया कि उसे जब उचित प्रतीत हो, वह अपनी कौंसिल के निर्णय को अस्वीकार कर सकता है।

पिट एक्ट का उद्देश्य

पिट एक्ट का उद्देश्य 1773 ई. के रेग्युलेटिंग एक्ट के कुछ स्पष्ट दोषों को दूर करना था। इसके द्वारा भारत में ब्रिटिश राज्य पर कम्पनी और इंग्लैण्ड की सरकार का संयुक्त शासन स्थापित कर दिया गया। 'कोर्ट आफ़ डाइरेक्टर्स' के हाथ में वाणिज्य का नियंत्रण तथा नियुक्तियाँ करने का कार्य रहने दिया गया, परन्तु 'कोर्ट आफ़ प्रोपाइटर्स' के हाथ से 'कोर्ट आफ़ डाइरेक्टर्स' का चुनाव करने के अतिरिक्त सब अधिकार छीन लिये गये। एक 'बोर्ड ऑफ़ कन्ट्रोल' की स्थापना कर दी गई। इसमें छह अवैतनिक प्रिवी कौंसिलर होते थे। उनमें से एक को अध्यक्ष बना दिया जाता था और उसे निर्णायक मत प्राप्त होता था।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

भट्टाचार्य, सच्चिदानन्द भारतीय इतिहास कोश, द्वितीय संस्करण-1989 (हिन्दी), भारत डिस्कवरी पुस्तकालय: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, 241।

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