दिल्ली दरबार, 1903  

सन 1903 में दिल्ली दरबार लॉर्ड कर्ज़न द्वारा आयोजित किया गया था, जिसमें बादशाह एडवर्ड सप्तम की ता­ज़पोशी की घोषणा की गई। यह दरबार पहले से भी ज़्यादा ख़र्चीला सिद्ध हुआ। इसका कुछ नतीजा नहीं निकला। यह केवल ब्रिटिश सरकार का शक्ति प्रदर्शन ही था।

इतिहास

दूसरा दिल्ली दरबार एडवर्ड सप्तम एवं महारानी एलेक्जैंड्रा को भारत के सम्राट एवं सम्राज्ञी घोषित करने हेतु लगा था। लॉर्ड कर्ज़न द्वारा दो पूरे सप्ताहों के कार्यक्रम आयोजित करवाये गये थे। यह शान शौकत के प्रदर्शन का एक बड़ा मौका था। इस धूम धाम का मुकाबला ना तो 1877 का, ना ही आने वाला 1911 का दरबार कर पाया। 1902 के अंतिम कुछ ही महीनों में, एक निर्वासित समतल मैदान को एक सुंदर भव्य अस्थायी नगर में परिवर्तित कर दिया गया। इसमें एक अस्थायी छोटी रेलगाड़ी प्रणाली लोगों की बड़ी भीड़ को दिल्ली के बाहर से यहां तक लाने-ले जाने हेतु चलायी गयी थी। एक पोस्ट ऑफिस, जिसकी अपनी मुहर थी; दूरभाष एवं बेतार सुविधाएं, विशेष रूप से निर्धरित वर्दी में एक पुलिस बल, तरह-तरह की दुकानें, अस्पताल, मैजिस्ट्रेट का दरबार, जटिल स्वच्छता प्रणाली, विद्युत प्रकाश प्रयोजन, इत्यादि, बहुत कुछ यहां था। इस कैम्प मैदान के स्मरणीय नक्शे एवं मार्गदर्शिकाएँ बांटे गये। विशेष कार्यों के लिये पदक निर्धारण, प्रदर्शनियां, अतिशबाज़ी एवं भड़कीले नृत्य आयोजन भी किये गये।

हीरे जवाहरातों का प्रदर्शन

लेकिन लॉर्ड कर्ज़न को गहन निराशा हुई, जब एडवर्ड सप्तम ने इस आयोजन में स्वयं ना आकर, अपने भाई, ड्यूक ऑफ़ कनाट को भेज दिया। वह बम्बई (वर्तमान मुम्बई) से ट्रेन द्वारा, कई बड़ी हस्तियों सहित एकदम तभी आया, जब कर्ज़न और उसकी सरकार के लोग दूसरी दिशा से कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) से पहुंचे। उनकी प्रतीक्षारत समूह में हीरे जवाहरातों का शायद सबसे बड़ा प्रदर्शन उपस्थित था। प्रत्येक भारतीय राजकुमार एवं राजा सदियों से संचित जवाहरातों से सजे हुए थे। ये सभी महाराजागण भारत के सभी प्रांतों से आये हुए थे, कई तो आपस में पहली बार मिल रहे थे। वहीं भारतीय सेना ने अपने सेनाध्यक्ष की अगुवाई में परेड निकाली, बैण्ड बजाये एवं जनसाधारण की भीड़ को संभाला।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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