नरेन्द्र देव  

नरेन्द्र देव
नरेन्द्र देव
पूरा नाम आचार्य नरेन्द्र देव
अन्य नाम अविनाशी लाल (बचपन में)
जन्म 31 अक्टूबर, 1889
जन्म भूमि सीतापुर, उत्तर प्रदेश
मृत्यु 19 फ़रवरी, 1956
मृत्यु स्थान मद्रास
नागरिकता भारतीय
प्रसिद्धि समाजवादी, विचारक, शिक्षाशास्त्री और देशभक्त
आंदोलन असहयोग आंदोलन
जेल यात्रा सन 1930, 1932 और 1942 के आंदोलनों में आचार्य नरेन्द्र देव ने जेल यात्राएँ कीं।
भाषा ज्ञान हिन्दी, संस्कृत, फ़ारसी, अंग्रेज़ी, पाली
अन्य जानकारी नरेन्द्र देव सन 1916 से 1948 तक 'ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी' के सदस्य रहे थे। देश की आज़ादी के लिए इन्होंने कई बार जेल यात्राएँ भी कीं और जवाहरलाल नेहरू के साथ अहमदनगर क़िले में भी बन्द रहे।

नरेन्द्र देव (अंग्रेज़ी: Narendra Deva, जन्म- 31 अक्टूबर, 1889, उत्तर प्रदेश; मृत्यु- 19 फ़रवरी, 1956, मद्रास) भारत के प्रसिद्ध विद्वान, समाजवादी, विचारक, शिक्षाशास्त्री और देशभक्त थे। अपने पिता के प्रभाव से ही इनका राजनीति की ओर झुकाव हुआ था। नरेन्द्र देव गरम विचारों के व्यक्ति थे। वे सन 1916 से 1948 तक 'ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी' के सदस्य रहे थे। देश की आज़ादी के लिए इन्होंने कई बार जेल यात्राएँ भी कीं और जवाहरलाल नेहरू के साथ अहमदनगर क़िले में भी बन्द रहे। नरेन्द्र जी का व्यक्तित्व बड़ा ही असाधारण था। वे हिन्दी, संस्कृत, फ़ारसी, अंग्रेज़ी, पाली आदि भाषाओं पर समान अधिकार रखते थे। बौद्ध दर्शन के अध्ययन आदि में उनकी विशेष रुचि थी।

जन्म तथा नामकरण

नरेन्द्र देव का जन्म 31 अक्टूबर, 1889 ई. को सीतापुर, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनके पिता का नाम बलदेव प्रसाद था, जो एक प्रसिद्ध वकील थे। नरेन्द्र जी के बचपन का नाम अविनाशी लाल था। कुछ समय बाद उनके पिता अपने पैतृक नगर फैजाबाद वापस आ गए और यहीं पर अविनाशी लाल का बचपन बीता। इनके पिता के एक मित्र ने इनका नाम बदलकर नरेन्द्र देव रख दिया। घर का वातावरण धार्मिक और सामाजिक रूप में चेतना सजग था। इसके फलस्वरूप नरेन्द्र देव को अपने घर पर ही स्वामी रामतीर्थ, पंडित मदनमोहन मालवीय जैसे महानुभावों के दर्शन हुए। यहीं से उनके अंदर भारतीय संस्कृति के प्रति अनुराग उत्पन्न हुआ और पिता के प्रभाव से राजनीति की ओर भी झुकाव हो गया।

व्यावसायिक जीवन

अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद नरेन्द्र देव ने अपने व्यावसायिक जीवन के तहत सन 1920 तक फैजाबाद में वकालत की, परन्तु राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का 'असहयोग आंदोलन' आंरभ होते ही इन्होंने वकालत त्याग दी। बाद में पंडित जवाहरलाल नेहरू के परामर्श पर वे 'काशी विद्यापीठ' में अध्यापक होकर चले गए। सन 1926 में नरेन्द्र देव इस संस्था के कुलपति भी बन गए। यहीं पर श्रीप्रकाश ने आपको 'आंयार्य' सम्बोधन से पुकारना शुरू किया, जो जीवन पर्यन्त इनके नाम का अंग बना रहा।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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