एम. ए. अय्यंगार  

एम. ए. अय्यंगार
एम. ए. अय्यंगार
पूरा नाम मदभूषी अनन्तशयनम् अय्यंगार
जन्म 4 फ़रवरी, 1891
जन्म भूमि तिरुपति, आंध्र प्रदेश
मृत्यु 19 मार्च, 1978
नागरिकता भारतीय
पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
पद लोकसभा अध्यक्ष और बिहार के राज्यपाल
शिक्षा कला स्नातक, वकालत (मद्रास लॉ कालेज)
लोकसभा अध्यक्ष कार्यकाल 8 मार्च, 1956 - 16 अप्रॅल, 1962
अन्य जानकारी एक तेलुगू साप्ताहिक पत्रिका 'श्री वेंकटेश पत्रिका' के नियमित सम्पादन के अलावा अय्यंगार ने भारतीय संसद पर "अवर पार्लियामेंट" नामक पुस्तक भी लिखी।

मदभूषी अनन्तशयनम् अय्यंगार (अंग्रेज़ी: Madabhushi Ananthasayanam Ayyangar, जन्म: 4 फ़रवरी, 1891, मृत्यु: 19 मार्च, 1978) भारत के दूसरे लोकसभा अध्यक्ष थे। लोकसभा के प्रथम अध्यक्ष जी.वी. मावलंकर के आकस्मिक निधन से पैदा हुई रिक्तता को भरने के लिए अध्यक्ष पद का दायित्व ग्रहण करके मदभूषी अनन्तशयनम् अय्यंगार ने स्वतंत्रता की उपलब्धियों तथा नव गणतंत्र में स्वस्थ संसदीय संस्कृति को विकसित करने के अधूरे कार्य को आगे बढ़ाने के लिए अपने आपको सर्वोपयुक्त सिद्ध किया। अय्यंगार ने छह दशक के अपने सार्वजनिक जीवन में, एक वकील, सामाजिक कार्यकर्त्ता तथा स्वतंत्रता सेनानी के रूप में, उत्कृष्ट सांसद तथा लोक सभा अध्यक्ष और एक प्रतिष्ठित विद्वान् के रूप में, जीवन में जिस भी कार्यक्षेत्र को चुना उसमें अपने व्यक्तित्व की अमिट छाप छोड़ी। ये बिहार के राज्यपाल भी रहे।

जीवन परिचय

मदभूषी अनन्तशयनम् अय्यंगार का जन्म 4 फ़रवरी, 1891 को आंध्र प्रदेश की आध्यात्मिक नगरी तिरुपति के निकट तिरुचाणुर में हुआ था। देवस्थानम हाई स्कूल, तिरूपति में अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के पश्चात् अय्यंगार उच्च शिक्षा के लिए मद्रास चले गए। पचयप्पाज कॉलेज, मद्रास से कला स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने 1913 में 'मद्रास लॉ कॉलेज' से क़ानून में डिग्री प्राप्त की।

आरंभिक जीवन

अय्यंगार ने अपना जीवन गणित के अध्यापक के रूप में 1912 में आरंभ किया। 1915 में वे क़ानून के पेशे में आ गए। कुछ ही समय में वह एक पेशेवर वकील के रूप में स्थापित हो गए क्योंकि उनमें न्यायिक निर्णयों को याद रखने की अद्भुत क्षमता थी और जल्दी ही वे "निर्णयजन्य विधि के चलते-फिरते सारसंग्रह" के रूप में प्रख्यात हो गए। अय्यंगार इस व्यवसाय को मात्र जीविकोपार्जन का साधन नहीं मानते थे। उनकी इस बात में गहरी रुचि थी कि भारत की न्यायिक व्यवस्था में भारतीय जनता की आवश्यकताओं के अनुरूप सुधार किए जाएं, और यह मात्र अंग्रेज़ी न्यायिक प्रणाली की एक शाखा बन कर न रह जाए। अतः उन्होंने न्यायपालिका की स्वतंत्रता की जमकर वकालत की तथा भारत सरकार से फेडरल न्यायालय के स्तर को बढ़ाकर इसे उच्चतम न्यायालय का दर्जा देने की मांग की। भारतीय न्यायिक प्रणाली में अंतिम अपील का प्राधिकार इंग्लैंड की प्रिवी काउंसिल में निहित होने के कारण भारतीयों को जो कठिनाइयाँ पेश आती थीं और जिस प्रकार तिरस्कार सहना पड़ता था, उसके बारे में वह बहुत चिंतित थे। अय्यंगार एक सक्रिय वकील थे और अपने गृह नगर चित्तूर की 'बार एसोसिएशन' के अध्यक्ष भी थे।

स्वतंत्रता आंदोलन

अय्यंगार बहुत छोटी उम्र में ही स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े थे। वे अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व कर रही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अपने गृह राज्य के प्रमुख नेताओं में से एक थे। गांधी जी द्वारा अंग्रेज़ी के प्रति "असहयोग" के लिए किए गए आह्वान के प्रत्युत्तर में अय्यंगार ने 1921-22 के दौरान एक वर्ष के लिए अपना क़ानूनी अभ्यास भी बंद कर दिया।

1934 में जब कांग्रेस ने काउंसिलों के बहिष्कार की अपनी नीति वापस ली और 'सेन्ट्रल लेजिस्लेटिव असेम्बली' के चुनाव लड़ने का निर्णय लिया तो अय्यंगार भारी बहुमत से असेम्बली के सदस्य निर्वाचित हुए। चुनाव लड़ने के पीछे कांग्रेस का उद्देश्य यही था कि सरकार में रहकर सरकार से संघर्ष किया जाए। तथ्यों और आंकड़ों के पूर्ण जानकार और स्वाभाविक रूप से वाद-विवाद में निपुण होने के कारण अय्यंगार ने जल्द ही केन्द्रीय विधान सभा में एक सशक्त वाद-विवादकर्ता सदस्य के रूप में अपनी छवि बना ली। वे पिछली कतार से अगली कतार में आ गए और फिर एक समय ऐसा भी आया कि ऐसा कोई दिन नहीं होता था जब वे सभा में सरकार के विरुद्ध कांग्रेस और राष्ट्रीय आंदोलन के हित में कोई जबरदस्त बात न कहते हों। सभा में अय्यंगार की इस उल्लेखनीय कार्यशैली से प्रभावित होकर एक यूरोपीय लेखक ने उनका ज़िक्र "सभा के एम्डेन" के रूप में किया था।[1]

भारत छोड़ो आंदोलन

1940 और 1944 के बीच, अय्यंगार को पहले "व्यक्तिगत सत्याग्रह आन्दोलन" में और बाद में 1942 के "भारत छोड़ो आंदोलन" में भाग लेने के लिए लगभग तीन वर्ष के लिए कारावास की सजा भोगनी पड़ी। अय्यंगार ने देश के राजनीतिक स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भाग लेने के अलावा समाज के दलित वर्गों के सामाजिक स्वातंत्र्य के लिए किए गए कई अन्य क्रियाकलापों में योगदान दिया। अस्पृश्यता जैसी सामाजिक बुराइयों से लड़ने के लिए गांधी जी के रचनात्मक कार्यक्रमों से प्रेरित होकर अय्यंगार मंदिर में हरिजनों का प्रवेश और अपने गृह राज्य में अस्पृश्यता का उन्मूलन सुनिश्चित करने के लिए आरंभ किए गए इस तरह के आंदोलनों में सबसे आगे रहे। अय्यंगार ने बाद में, 'हरिजन सेवक संघ' के अध्यक्ष की हैसियत से हरिजनों के आर्थिक एवं सामाजिक उत्थान के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. "एम्डेन" जर्मनी की एक पनडुब्बी का नाम था, जिसने द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रारंभिक दिनों में मित्र देशों की नौसेना की भारी क्षति की थी।

बाहरी कड़ियाँ

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