दादू दयाल  

(दादूदयाल से पुनर्निर्देशित)


दादू दयाल
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जन्म संवत् 1601 (सन् 1544 ई.)
जन्म भूमि अहमदाबाद
मृत्यु संवत् 1660 (सन् 1603 ई.)
अभिभावक लोदीराम और बसी बाई
संतान पुत्र- ग़रीबदास और मिस्कीनदास, पुत्रियाँ- नानीबाई तथा माताबाई
कर्म भूमि गुजरात
कर्म-क्षेत्र समाज सुधाकर काव्य
मुख्य रचनाएँ साखी, पद्य, हरडेवानी, अंगवधू
विषय धर्मनिर्पेश, समाज सुधारक
भाषा हिन्दी, गुजराती, राजस्थानी
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी भारत के अन्य भक्त और संत की तरह दादू दयाल के जीवन के बारे में भी प्रामाणिक जानकारी का अभाव है। इनका जन्म, मृत्यु, जीवन और व्यक्तित्व किंवदन्तियों, अफ़वाहो और कपोल-कल्पनाओं से ढका हुआ है।
इन्हें भी देखें कवि सूची, साहित्यकार सूची

दादू दयाल (अंग्रेज़ी: Dadu Dayal, जन्म: 1544 ई.; मृत्यु: 1603 ई.) हिन्दी के भक्तिकाल में ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रमुख सन्त कवि थे। इन्होंने एक निर्गुणवादी संप्रदाय की स्थापना की, जो 'दादूपंथ' के नाम से ज्ञात है। वे अहमदाबाद के एक धुनिया के पुत्र और मुग़ल सम्राट् शाहजहाँ (1627-58) के समकालीन थे। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन राजपूताना में व्यतीत किया एवं हिन्दू और इस्लाम धर्म में समन्वय स्थापित करने के लिए अनेक पदों की रचना की। उनके अनुयायी न तो मूर्तियों की पूजा करते हैं और न कोई विशेष प्रकार की वेशभूषा धारण करते हैं। वे सिर्फ़ राम का नाम जपते हैं और शांतिमय जीवन में विश्वास करते हैं, यद्यपि दादू पंथियों का एक वर्ग सेना में भी भर्ती होता रहा है। भारत के अन्य भक्त और संत की तरह दादू दयाल के जीवन के बारे में भी प्रामाणिक जानकारी का अभाव है। इनका जन्म, मृत्यु, जीवन और व्यक्तित्व किंवदन्तियों, अफ़वाहो और कपोल-कल्पनाओं से ढका हुआ है। इसका एक कारण यह है कि ये संत आम जनता के बीच से उभरे थे।

जीवन परिचय

दादू पेशे से धुनिया थे और बाद में वह धार्मिक उपदेशक तथा घुमक्कड़ बन गए। वह कुछ समय तक सांभर व आंबेर और अंततः नारायणा में रहे, जहाँ उनकी मृत्यु हुई। ये सभी स्थान जयपुर तथा अजमेर (राजस्थान राज्य) के आसपास है। उन्होंने वेदों की सत्ता, जातिगत भेदभाव और पूजा के सभी विभेदकारी आडंबरों को अस्वीकार किया। इसके बदले उन्होंने जप (भगवान के नाम की पुनरावृत्ति) और आत्मा को ईश्वर की दुल्हन मानने जैसे मूल भावों पर ध्यान केंद्रित किया। उनके अनुयायी शाकाहार और मद्यत्याग पर ज़ोर देते हैं और सन्न्यास दादू पंथ का एक अनिवार्य घटक है। दादू के उपदेश मुख्यतः काव्य सूक्तियों और ईश्वर भजन के रूप में हैं, जो 5,000 छंदों के संग्रह में संग्रहीत है, जिसे बानी (वाणी) कहा जाता है। ये अन्य संत कवियों, जैसे कबीर, नामदेव, रविदास और हरिदास की रचनाओं के साथ भी किंचित परिवर्तित छंद संग्रह पंचवाणी में शामिल हैं। यह ग्रंथ दादू पंथ के धार्मिक ग्रंथों में से एक है। आम जनता का विवरण आम तौर पर कहीं नहीं मिलता। यही कारण है कि इन संतों के जीवन का प्रामाणिक विवरण हमें नहीं मिलता। दादू, रैदास और यहाँ तक की कबीर का नामोल्लेख भी उस युग के इतिहास-ग्रंथों में यदा-कदा ही मिलता है। संतों का उल्लेख उनकी मृत्यु के वर्षों बाद मिलने लगता है, जब उनके शिष्य संगठित राजनीतिक-सामाजिक शक्ति के रूप में उभर कर आने लगे थे। इतनी उपेक्षा के बावजूद, दादू दयाल उन कवियों में से नहीं हैं, जिन्हें भारतीय जनता ने भुला दिया हो। आधुनिक शोधकर्ताओं ने अनुसंधान करके ऐसे अनेक विस्मृत कवियों को खोज निकालने का गौरव प्राप्त किया है।

विभिन्न मतों के अनुसार

  • चंद्रिका प्रसाद त्रिपाठी के अनुसार अठारह वर्ष की अवस्था तक अहमदाबाद में रहे, छह वर्ष तक मध्य प्रदेश में घूमते रहे और बाद में सांभर (राजस्थान) में आकर बस गये। यदि दादू का जन्म अहमदाबाद में ही हुआ था, तो वे सांभर कब और क्यों आये। सांभर आने से पहले उन्होंने क्या किया था और कहाँ-कहाँ भ्रमण कर चुके थे। इसकी प्रामाणिक सूचना हमें नहीं मिलती।
  • जन गोपाल की 'परची' के अनुसार दादू तीस वर्ष की अवस्था में सांभर में आकर रहने लगे थे। सांभर निवास के दिनों के बाद की उनकी गतिविधियों की थोड़ी बहुत जानकारी मिलती है। सांभर के बाद वह कुछ दिनों तक आमेर में (जयपुर के निकट) रहे। यहाँ पर अभी भी एक 'दादू द्वारा' बना हुआ है।
  • कुछ लोगों का कहना है, दादू ने फ़तेहपुर सीकरी में अकबर से भेंट की थी और चालीस दिनों तक आध्यात्मिक विषयों की चर्चा भी करते रहे थे। यद्यपि ऐतिहासिक दस्तावेज़ों में यह जानकारी उपलब्ध नहीं है। यह अनुमान का विषय है।[1] वैसे अकबर ने उस युग के अनेक धार्मिक भक्तों और संतों से विचार-विमर्श किया था। कई हिन्दू संत भी उनसे मिलने गये थे। सम्भव है उनमें दादू भी एक रहे हों और अपने जीवन काल में इतने प्रसिद्ध न होने के कारण उनकी ओर ध्यान केन्द्रित न किया गया हो। अन्य संतों की तरह दादू दयाल ने भी काफ़ी देश-भ्रमण किया था। विशेषकर उत्तर भारत, काशी), बिहार, बंगाल और राजस्थान के भीतरी भागों में लम्बी यात्राएँ की थीं। अन्त में, ये नराणा, राजस्थान में रहने लगे, जहाँ उन्होंने अपनी इहलीला समाप्त की।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

पुस्तक सन्दर्भ:- दादू दयाल, लेखक- रामबक्ष, प्रकाशक- साहित्य अकादमी

  1. दूसरी परम्परा की खोज, पृ. 55
    नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 1982
  2. दादू दयाल ग्रंथावली, पृ. 3
  3. दादू दयाल ग्रंथावली, पृ. 97
  4. दादू दयाल ग्रंथावली, पृ.455
  5. दादू दयाल ग्रंथावली, पृ. 470-471
  6. दादू दयाल ग्रंथावली, पृ. 400
  7. दादू दयाल ग्रंथावली, पृ. 469
  8. दादू दयाल ग्रंथावली, पृ. 214
  9. दादू दयाल ग्रंथावली, पृ. 215
  10. दादू दयाल ग्रंथावली, पृ. 214
  11. दादू दयाल ग्रंथावली, पृ. 25
  12. दादू दयाल ग्रंथावली, पृ. 325
  13. दादू दयाल ग्रंथावली, पृ. 453
  14. दादू दयाल ग्रंथावली, पृ. 477
  15. दादू दयाल ग्रंथावली, भूमिका, पृ. 12
  16. दादू दयाल ग्रंथावली, भूमिका, पृ. 12-13

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