पुष्पदन्त कवि  

Disamb2.jpg पुष्पदन्त एक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- पुष्पदन्त (बहुविकल्पी)

पुष्पदन्त जैन साहित्य के अत्यंत प्रसिद्ध महाकवि थे। इन्होंने अपने ग्रंथ 'णाय कुमार चरित' [1] के अंत में अपने माता पिता का संकेत करते हुए सम्प्रदाय का भी उल्लेख किया है।[2] उसके अनुसार इनके पिता प्रथमत: शिव भक्त थे, किंतु बाद में किसी 'जिन' संन्यासी के उपदेश से जैन धर्म में दीक्षित हो गये थे। पिता के सम्प्रदाय परिवर्तन के साथ ये भी जैन हो गये। पिता का नाम 'केशव भट्ट' और माता का नाम 'मुग्धा देवी' था।

अपभ्रंश के कवि

रचनाओं की भाषा देखते हुए अनुमान होता है कि ये उत्तरी भारत के ही निवासी होंगे, क्योंकि दक्षिण भाषाओं का इनकी रचनाओं पर कोई प्रभाव नहीं है। इनकी भाषा को 'ब्राचड़ अपभ्रंश' या उसी से प्रभावित भाषा मानना चाहिए। कवि में आत्म सम्मान की भावना विशेष रूप में थी। एक बार निर्जन वन में पड़े रहने पर जब 'अम्मइयं' और 'इन्द्र' नामक व्यक्तियों द्वारा कारण पूछा गया तब इन्होंने कहा -

णउ दुज्जन भउँहा वंकियाइं, दीसंतु कालुसभावंकियाइं।
वर णरतरू धवलच्छिहे होहु म कुच्छिहे मरउ सोणिमुहिणग्गमे।
खल कुच्छिय पहुवयणइं भिउडियण यणैं म णिहालउ सुरुग्गमे॥[3]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. नाग कुमार चरित
  2. सिव भत्ताइं मि जिण सण्णासें वे वि मयाइं दुरियणिण्णासें। वंभणाइं कासवरिसि गोत्तइं गुरुवयणामिय पूरियसोत्तमं॥
  3. दुर्जन की बंकिम भौंह देखना उचित नहीं, चाहे गिरि कण्दराओं में घास खाकर भले ही रहा जाए। माँ के कुक्ष से उत्पन्न होते ही मर जाना ठीक है, किंतु राजा के टेढ़ी भृकुटी के नेत्र देखना और दुर्वचन सुनना उचित नहीं।
  4. कसण सरीरें सुछ कुरूवें मुद्धाएवि गब्भ सम्भूवें। उत्तर पुराण 11।
  5. सिय दंत पंति धवलीकयासु ता जंपइ बरवाया विलासु।
  6. तिसट्ठि महापुरिष गुणालंकार - महापुराण
  7. णाय कुमार चरिउ

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