गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही'  

गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही'
पं. गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही'
पूरा नाम पं. गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही'
अन्य नाम 'त्रिशूल' (उपनाम) 'तरंगी', 'अलमस्त'
जन्म 1883 ई. (संवत 1940)
जन्म भूमि हडहा गाँव, उन्नाव ज़िला, उत्तर प्रदेश
मृत्यु 20 मई, 1972 ई. (उम्र- 89 वर्ष)
मृत्यु स्थान कानपुर
अभिभावक पिता- पं. अक्सेरीलाल शुक्ल
कर्म-क्षेत्र अध्यापन, कवि, सम्पादन
मुख्य रचनाएँ प्रेम पच्चीसी, कुसुमांजलि, कृषक क्रंदन, त्रिशूल तरंग, राष्ट्रीय मन्त्र, संजीवनी, राष्ट्रीय वाणी, कलामे त्रिशूल, करुणा-कादम्बिनी अादि
विषय समाज सुधार और स्वाधीनता प्रेम
भाषा ब्रजभाषा, खड़ीबोली
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी वर्तमान के अनेक प्रसिद्ध कवि अपने को सनेही जी का शिष्य कहने में गौरव का अनुभव करते हैं। इन्होंने कवि सम्मेलनों की परंपरा का भी विकास किया और जीवन में अनेक कवि सम्मेलनों का सभापतित्व भी किया।
इन्हें भी देखें कवि सूची, साहित्यकार सूची

पं. गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' (अंग्रेज़ी: Pt. Gayaprasad Shukla 'Sanehi', जन्म: 1883 ई. - मृत्यु: 20 मई, 1972 ई.) ब्रजभाषा के प्रसिद्ध कवि थे।

जीवन परिचय

पं. गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' जी का जन्म श्रावण शुक्ल त्रयोदशी, संवत 1940 में उन्नाव ज़िले के हडहा नामक ग्राम में हुआ। यह गाँव बैसवाड़ा क्षेत्र के अंतर्गत है। सनेही जी के पिता पं. अक्सेरीलाल शुक्ल बड़े साहसी और देशभक्त व्यक्ति थे। 1850 ई. के स्वातंत्र्य संग्राम में उन्होंने भी जमकर भाग लिया और ब्रिटिश सरकार के कोपभाजन बने। देशभक्ति और वीरभाव की यह परंपरा सनेही जी को अपने पिता से ही प्राप्त हुई। सनेही जी आरम्भ से ही मेधावी छात्र रहे। काव्यरचना का शौक इन्हें बचपन से ही था। काव्यशास्त्र का सम्यक अनुशील इन्होंने हडहा निवासी लाला गिरधारी लाल के चरणों में बैठकर किया। लालाजी रीतिशास्त्र के बड़े पंडित और ब्रजभाषा के सिद्धस्त कवि थे।

कार्यक्षेत्र

सनेही जी ने अपनी जीविका के लिए शिक्षक की वृति अपनाई। सन 1902 में ये शिक्षण पद्धति का प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए दो वर्ष लखनऊ आकर रहे। यहाँ इनकी प्रतिभा का और भी विकास हुआ तथा ये ब्रजभाषा, खड़ीबोली एवं उर्दू के कवियों के संपर्क में आये। सनेही जी इन तीनों भाषाओं में काव्यरचना करते थे परन्तु रससिद्ध कविता की दृष्टि से ये प्रमुखतः ब्रजभाषा के ही कवि थे। इनकी प्रसिद्धि होने पर पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इन्हें खड़ीबोली काव्यरचना की ओर प्रेरित किया और इस क्षेत्र में भी सनेही जी का अद्वितीय स्थान रहा परन्तु ब्रजभाषा में भी ये आजीवन लिखते रहे। शिक्षा विभाग में नौकरी करने के कारण इन्होंने अपनी राष्ट्रीय कवितायेँ 'त्रिशूल' उपनाम से लिखीं। सनेही नाम से ये परंपरागत और रससिद्ध कवितायें करते थे और त्रिशूल उपनाम से ये समाजसुधार और स्वाधीनता प्रेम की रचनाएं लिखते थे। 'तरंगी' और 'अलमस्त' ये दोनों भी सनेही जी के उपनाम हैं। असहयोग आन्दोलन के समय इन्होंने टाउन स्कूल की हेड मास्टरी से त्यागपत्र दे दिया और कानपुर को अपना कर्मक्षेत्र बनाकर स्वाधीनता के कार्यों में अपने को खपा दिया।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 1.3 1.4 पं. गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' (हिन्दी) राजभाषा हिन्दी ब्लॉग। अभिगमन तिथि: 1 जून, 2015।

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