बुल्ले शाह  

बुल्ले शाह
बुल्ले शाह
पूरा नाम अब्दुल्ला शाह
अन्य नाम साईं बुल्ले शाह, बुल्ला
जन्म 1680 ई.
जन्म भूमि गिलानियाँ उच्च वर्तमान पाकिस्तान
मृत्यु 1758 ई.
अभिभावक शाह मुहम्मद दरवेश
कर्म-क्षेत्र साहित्यकार
मुख्य रचनाएँ बुल्ले नूँ समझावन आँईयाँ, अब हम गुम हुए, किससे अब तू छिपता है
भाषा पंजाबी, उर्दू, हिंदी
संबंधित लेख हज़रत मुहम्मद
अन्य जानकारी बुल्ले शाह जी ने पंजाबी मुहावरे में अपने आपको अभिव्यक्त किया। जबकि अन्य हिन्दी और सधुक्कड़ी भाषा में अपना संदेश देते थे। पंजाबी सूफियों ने न केवल ठेठ पंजाबी भाषा की छवि को बनाए रखा बल्कि उन्होंने पंजाबियत व लोक संस्कृति को सुरक्षित रखा।
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बुल्ले शाह की रचनाएँ

बाबा बुल्ले शाह (अंग्रेज़ी: Bulleh Shah, जन्म- 1680 ई., गिलानियाँ उच्च, वर्तमान पाकिस्तान; मृत्यु- 1758 ई.) पंजाबी सूफ़ी काव्य के आसमान पर एक चमकते सितारे की तरह थे। उनकी काव्य रचना उस समय की हर किस्म की धार्मिक कट्टरता और गिरते सामाजिक किरदार पर एक तीखा व्यंग्य है। बाबा बुल्ले शाह ने बहुत बहादुरी के साथ अपने समय के हाकिमों के ज़ुल्मों और धार्मिक कट्टरता विरुद्ध आवाज़ उठाई। बाबा बुल्ले शाह जी की कविताओं में काफ़ियां, दोहड़े, बारांमाह, अठवारा, गंढां और सीहरफ़ियां शामिल हैं । उनका मूल नाम अब्दुल्ला शाह था। आगे चलकर उनका नाम बुल्ला शाह या बुल्ले शाह हो गया। प्यार से लोग उन्हें साईं बुल्ले शाह या बाबा बुल्ला भी कहते हैं। वह इस्लाम के अंतिम नबी मुहम्मद की पुत्री फ़ातिमा के वंशजों में से थे।[1]

परिचय

बुल्ले शाह का जन्म 1680 ई. गिलानियाँ उच्च, वर्तमान पाकिस्तान में हुआ था। उनके जीवन से सम्बन्धित विद्वानों में मतभेद हैं। बुल्ले शाह के माता-पिता पुश्तैनी रूप से वर्तमान पाकिस्तान में स्थित बहावलपुर राज्य के "गिलानियाँ उच्च" नामक गाँव से थे, जहाँ से वे किसी कारण से मलकवाल गाँव (ज़िला मुलतान) गए। मालकवल में पंडोक नामक गाँव के मालिक अपने गाँव की मस्जिद के लिये मौलवी ढूँढते आए। इस कार्य के लिये उन्होंने बुल्ले शाह के पिता शाह मुहम्मद दरवेश को चुना और बुल्ले शाह के माता-पिता पाँडोके (वर्तमान नाम पाँडोके भट्टीयाँ) चले गए। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि बुल्ले शाह का जन्म पाँडोके में हुआ था और कुछ का मानना है कि उनका जन्म उच्च गिलानियाँ में हुआ था और उन्होंने अपने जीवन के पहले छः महीने वहीं बिताए थे। बुल्ले शाह के दादा सैय्यद अब्दुर रज्ज़ाक़ थे और वे सैय्यद जलाल-उद-दीन बुख़ारी के वंशज थे। सैय्यद जलाल-उद-दीन बुख़ारी बुल्ले शाह के जन्म से तीन सौ साल पहले सु़र्ख़ बुख़ारा नामक जगह से आकर मुलतान में बसे थे। बुल्ले शाह हज़रत मुहम्मद साहिब की पुत्री फ़ातिमा के वंशजों में से थे। उनके पिता शाह मुहम्मद थे जिन्हें अरबी, फारसी और क़ुरआन शरीफ का अच्छा ज्ञान था। उनके पिता के नेक जीवन का प्रभाव बुल्ले शाह पर भी पड़ा। उनकी उच्च शिक्षा कसूर में ही हुई। उनके उस्ताद हज़रत ख़्वाजा ग़ुलाम मुर्तज़ा सरीखे ख्यातनामा थे। पंजाबी कवि वारिस शाह ने भी ख़्वाजा ग़ुलाम मुर्तज़ा से ही शिक्षा ली थी। अरबी, फारसी के विद्वान् होने के साथ-साथ आपने इस्लामी और सूफी धर्म ग्रंथो का भी गहरा अध्ययन किया।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 हिन्दी कविता, बाबा बुल्ले शाह (हिंदी) www.hindi-kavita.com। अभिगमन तिथि: 16 फ़रवरी, 2017।
  2. बुल्ला की जाणां मैं कौन? - बुल्ले शाह पर विशेष प्रस्तुति (हिंदी) podcast.hindyugm.com। अभिगमन तिथि: 17 फ़रवरी, 2017।
  3. बुल्ले शाह (हिंदी) superzindagi.in। अभिगमन तिथि: 17 फ़रवरी, 2017।

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