नंददास  

नंददास
नंददास
पूरा नाम नंददास
जन्म संवत 1570 (1513 ई.) विक्रमी
जन्म भूमि रामपुर गांव, सोरों, उत्तर प्रदेश
मृत्यु संवत 1640 (1583 ई.) विक्रमी
मृत्यु स्थान मानसी गंगा, गोवर्धन
अभिभावक जीवाराम (पिता)
कर्म भूमि भारत
भाषा ब्रजभाषा
प्रसिद्धि अष्टछाप कवि
नागरिकता भारतीय
संबंधित लेख अष्टछाप कवि, गोसाईं विट्ठलनाथ, सूरदास, मानसी गंगा, गोवर्धन
दीक्षा गुरु गोसाईं विट्ठलनाथ
प्रभु लीला आसक्ति किशोर लीला
अन्य जानकारी भगवान श्रीकृष्‍ण का यश-चिन्‍तन ही नंददास के काव्‍य का प्राण था। वह कहा करते थे कि- "जिस कविता में 'हरि' के यश का रस न मिले, उसे सुनना ही नहीं चाहिये।" भगवान श्रीकृष्‍ण की रूप-माधुरी के वर्णन में उन्‍होंने जिस योग्‍यता का परिचय दिया
इन्हें भी देखें कवि सूची, साहित्यकार सूची

नंददास 16वीं शती के अंतिम चरण के कवि थे। वे 'अष्टछाप' के प्रमुख कवियों में से एक थे, जो सूरदास के बाद सबसे अधिक प्रसिद्ध हुए। नंददास भक्तिरस के पूर्ण मर्मज्ञ और ज्ञानी थे।

परिचय

नंददास जी का जन्म संवत 1570 (1513 ई.) विक्रमी में हुआ था। एक मान्यता के अनुसार इनका जन्म उत्तर प्रदेश के एटा ज़िले में सोरों के पास रामपुर गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम जीवाराम और चाचा का आत्माराम था। वे शुक्ल ब्राह्मण थे और रामपुर ग्राम के निवासी थे। कहते हैं कि गोस्वामी तुलसीदास उनके गुरुभाई थे। नंददास उनको बड़ी प्रतिष्ठा, सम्मान और श्रद्धा की दृष्टि से देखते थे। वे युवक होने पर उन्हीं के साथ काशी में रहकर विद्याध्ययन किया करते थे। नंददास के विषय में ‘भक्तमाल’ में लिखा है-

‘चन्द्रहास-अग्रज सुहृद परम प्रेम में पगे’

इससे इतना ही सूचित होता है कि इनके भाई का नाम चंद्रहास था। 'दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता' के अनुसार ये तुलसीदास के भाई थे, किन्तु अब यह बात प्रामाणिक नहीं मानी जाती। उसी वार्ता में यह भी लिखा है कि द्वारका जाते हुए नंददास सिंधुनद ग्राम में एक रूपवती खत्रानी पर आसक्त हो गए। ये उस स्त्री के घर में चारो ओर चक्कर लगाया करते थे। घरवाले हैरान होकर कुछ दिनों के लिए गोकुल चले गए। ये वहाँ भी जा पहुँचे। अंत में वहीं पर गोसाईं विट्ठलनाथ जी के सदुपदेश से इनका मोह छूटा और ये अनन्य भक्त हो गए। इस कथा में ऐतिहासिक तथ्य केवल इतना ही है कि इन्होंने गोसाईं विट्ठलनाथ जी से दीक्षा ली।

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