दूलनदास  

दूलनदास (जन्म- 1660 ई., लखनऊ; मृत्यु- 1778 ई.) रीति काल के प्रसिद्ध कवि और सतनामी सम्प्रदाय के संत-महात्मा थे। वे जाति से क्षत्रिय तथा गृहस्थ थे। ये जगजीवन साहब के शिष्य थे। इन्होंने 'धर्मो' नाम का एक ग्राम भी बसाया था। इनका सारा समय साधु-संगत, भजन-कीर्तन और उपदेश देने में व्यतीत होता था। इन्होंने साखी और पद आदि की भी रचनाएँ की हैं।

सतनामी संत

सतनामी सम्प्रदाय का आरम्भ कब और किसके द्वारा हुआ, यह तो ठीक से ज्ञात नहीं है, किंतु सतनामियों और मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब के बीच की लड़ाई में हज़ारों सतनामी मारे गये थे। इससे प्रतीत होता है कि यह मत यथेष्ट प्रचलित था और स्थानविशेष में इसने सैनिक रूप धारण कर लिया था। संवत 1800 के लगभग जगजीवन साहब ने इसका पुनरुद्धार किया। दूलनदास इन्हीं के शिष्य थे, जो एक अच्छे कवि थे। ये जीवनभर रायबरेली में ही निवास करते रहे।[1]

भाषा तथा उपदेश

दूलनदास की भाषा में भोजपुरी का मिश्रण है। अन्य संतों की भाँति गुरुभक्ति, समस्त प्राणियों के प्रति प्रेम तथा निर्गुण, निराकार परमात्मा की प्राप्ति यही इनके उपदेश हैं।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दू धर्मकोश |लेखक: डॉ. राजबली पाण्डेय |प्रकाशक: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान |पृष्ठ संख्या: 325 |

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