वररुचि  

वररुचि विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक थे। पाणिनि के बाद, कालिदास पूर्व महाकाव्य-परम्परा में लिखने वाले वररुचि का नाम लिया जाता है। संस्कृत वाङ्मय के इतिहास में वररुचि के नाम से कई ग्रन्थों के नाम मिलते हैं और कुछ सूक्ति-संग्रहों, जैसे- 'सुभाषितावली', 'शार्ङगधरपद्धति' और 'सदुक्तिकर्णामृत' आदि में भी अनेक पद्यों के रचयिता के रूप में उद्धृत हैं। वररुचि के विषय में जो प्रश्नचिह्न लगा है, उसका अब तक कोई समाधान नहीं निकला है। पाणिनीय व्याकरण पर वार्तिक लिखने वाले कत्यायन को तथा प्राकृत-प्रकाश नाम के प्राकृत-व्याकरण के रचयिता को भी वररुचि नाम से जाना जाता है। यहाँ तक, पालि भाषा का 'कच्चायन' व्याकरण भी कात्यायन द्वारा निर्मित होने से वररुचि से जुड़ जाता है। तारानाथ ने अपने 'भारत में बौद्ध धर्म का इतिहास' में 'ब्राह्मण-वररुचि' या 'आचार्य-वररुचि' को उद्धृत किया है।

रचना

अवन्तिसुन्दरीकथासार, प्राकृतमंजरी तथा बृहत्कथा (कथासरित्सागर, वृहत्कथामंजरी आदि) में वररुचि का नाम उद्धृत है। अन्य कई ग्रन्थ भी वररुचि के द्वारा निर्मित मिलते हैं, यद्यपि वे विभिन्न कालों में लिखे गये हैं तथा वे किसी एक व्यक्ति या समान व्यक्ति द्वारा निर्मित नहीं हो सकते। आचार्य बलदेव उपाध्याय तो इतना कहते हैं कि कवि वररुचि और वार्तिककार कात्यायन वररुचि तथा 'प्राकृत प्रकाश' के रचयिता वररुचि-दोनों भिन्न थे या अभिन्न इसे निश्चय पूर्वक सिद्धांत रूप से बतलाना कठिन काम है, फिर वे अनुमान के आधार पर दोनों को अभिन्न रूप में स्वीकार करते हैं।

पतञ्जलि ने महाभाष्य में वररुचि द्वारा प्रणीत काव्य का निर्देश 'वाररुचं काव्यम्' कह कर किया है, किन्तु यह रचना उपलब्ध नहीं है। सूक्तिमुक्तावली में यह पद्य मिलता है-

यथार्थता कथं नाम्नि मा मूद् वररुचिरिह।
व्यधत्त कण्ठाभरणं य: सदारोहणप्रिय:।।

आचार्य बलदेव उपाध्याय के उल्लेखानुसार 'कृष्णचरित' नामक काव्य के एक पद्य के आधार पर वररुचि के काव्य का यथार्थ नाम 'स्वर्गारोहण' सिद्ध होता है और ऊपर उद्धृत 'सूक्तिमुक्तावली' के पद्य में 'सदारोहणप्रिय:' के स्थान पर स्वर्गारोहण' पाठ ही उचित प्रतीत होता है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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