हितहरिवंश  

श्री हरिवंश (जन्म संवत 1559 विक्रमी) राधावल्लभ सम्प्रदाय के संस्थापक थे।

हरिवंश के पिता श्री व्यास सहारनपुर ज़िले के देववन के गौड़ ब्राह्मण थे, जो बहुत दिनों तक नि:सन्तान रहे। वे सम्राट की सेवा में थे। एक अवसर पर वे आगरा से सम्राट के पास आ रहे थे कि सं0 1559 वि0 में मथुरा के समीप बाद गाँव में उनकी पत्नी तारा ने एक पुत्र रत्न को जन्म दिया। जिन प्रभु की आराधना और याचना स्वरूप उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी, उनके आभार स्वरूप उन दोनों ने बालक का नाम हरिवंश (हरि सन्तान) रख दिया। बड़े होने पर उनको रुक्मिणी नाम की पत्नी मिलीं। उससे उन्हें तीन सन्तानें हुई, दो पुत्र और एक पुत्री। पुत्रों में से मोहनचन्द नि:सन्तान स्वर्गीय हो गये। छोटे पुत्र गोपीनाथ के वंशधर अब भी देवबन में हैं। पुत्री का विवाह करके उन्होंने संसार त्याग कर संन्यासी होने का निश्चय किया। इस दृढ़ निश्चय के साथ वे अकेले वृन्दावन की दिशा में चल पड़े और होडल के समीपस्थ चरथावल पहुँचे। वहाँ उन्हें एक ब्राह्मण मिला, जिसने उनकी सेवा में दो पुत्रियाँ भेंट करके प्रार्थना की कि वे उनको अपनी पत्नी बनायें। ऐसा उस (ब्राह्माण) ने एक स्वप्न में प्राप्त दैवी आज्ञा शक्ति के अधीन किया। ब्राह्मण ने उन्हें राधावल्लभ नामक एक कृष्ण विग्रह भी दिया। जब वे वृन्दावन पहुँच गये तो श्री हरिवंश ने उसे यमुना किनारे जुगल और कोलिया घाट के मध्य संस्थापित मन्दिर में प्रतिष्ठित कर दिया। मूलत: वे माधवाचार्य सम्प्रदायी थे। निम्बार्क सम्प्रदायी भी उन पर अपना दावा करते हैं।

इन दोनों से ही उन्होंने अपने सिद्धान्त और शास्त्र विधि प्रतिज्ञापूर्वक ग्रहण किये। उस रहस्यमयी घटना के फलस्वरूप, जिससे वे सन्न्यस्त जीवन जीने की इच्छा को भूलकर दोनों पत्नियों में रमे अथवा अपनी अदम्य स्वाभाविक विषय वासनाओं के फलस्वरूप जिन पर वे विजय न पा सके, अत: कल्पना का बहाना बनाया। उनकी भक्ति स्वयं कृष्ण के प्रति न होकर (गौण रूप को छोड़कर) उनकी कल्पित अर्द्धांगनी राधा के प्रति समर्पित हो गई, जिसे उन्होंने श्रृंगार की देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया। तनिक भी आश्चर्य नहीं कि आरम्भ में इस व्यवस्था को स्तुत्य नहीं समझा गया, जैसा कि भक्तमाल की निम्नोक्त भाषा से स्पष्ट होता है

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