बीरबल  

बीरबल
बीरबल
पूरा नाम राजा बीरबल
अन्य नाम महेशदास
जन्म 1528 ई.
जन्म भूमि त्रिविक्रमपुर, कानपुर, उत्तर प्रदेश[1]
मृत्यु तिथि 1586 ई.
मृत्यु स्थान स्वात, भारत (अब पाकिस्तान)
उपाधि अकबर ने बीरबल को 'राजा' और 'कविराय' की उपाधि से सम्मानित किया था।
धार्मिक मान्यता दीन-ए-इलाही
प्रसिद्धि अकबर के नवरत्नों में से एक
उपनाम बीरबल का उपनाम ब्रह्म था।[2]
अन्य जानकारी राजा बीरबल दान देने में अपने समय अद्वितीय थे और पुरस्कार देने में संसार-प्रसिद्ध थे। गान विद्या भी अच्छी जानते थे। उनके कवित्त और दोहे प्रसिद्ध हैं।

बीरबल (जन्म-1528 ई.; मृत्यु- 1586 ई.) मुग़ल बादशाह अकबर के अकबर के नवरत्नों में सर्वाधिक लोकप्रिय एक ब्राह्मण दरबारी था। बीरबल की व्यंग्यपूर्ण कहानियों और काव्य रचनाओं ने उन्हें प्रसिद्ध बनाया था। बीरबल ने दीन-ए-इलाही अपनाया था और फ़तेहपुर सीकरी में उनका एक सुंदर मकान था।[3] बादशाह अकबर के प्रशासन में बीरबल मुग़ल दरबार का प्रमुख वज़ीर था और राज दरबार में उसका बहुत प्रभाव था। बीरबल कवियों का बहुत सम्मान करता था। वह स्वयं भी ब्रजभाषा का अच्छा जानकार और कवि था।

परिचय

राजा बीरबल का जन्म संवत 1584 विक्रमी में कानपुर ज़िले के अंतर्गत 'त्रिविक्रमपुर' अर्थात् तिकवांपुर में हुआ था। भूषण कवि ने अपने जन्मस्थान त्रिविक्रमपुर में ही इनका जन्म होना लिखा है।[1]प्रयाग के अशोक-स्तंभ पर यह लेख है-

संवत 1632 शाके 1493 मार्ग बदी 5 सोमवार गंगादास सुत महाराज बीरबल श्री तीरथराज की यात्रा सुफल लिखितं।

बदायूंनी ने बीरबल के उपनाम ब्रह्म में दास मिलाकर इनका नाम ब्रह्मदास लिखा है।[4]ये कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे।[1] अकबर ने बीरबल को 'राजा' पदवी दी थी। बीरबल उतना प्रभावशाली सेनापति नहीं था, जितना प्रभावशाली कवि था। कुछ इतिहासकारों ने बीरबल को राजपूत सरदार बताया है। बीरबल अकबर का स्नेहपात्र था। अकबर ने बीरबल को 'राजा' और 'कविराय' की उपाधि से सम्मानित किया था। पर उनका साहित्यिक जीवन अकबर के दरबार में मनोरंजन करने तक ही सीमित रहा।

प्रभावशाली कवि

महाराज बीरबल ब्रजभाषा के अच्छे कवि थे और कवियों का बड़ी उदारता के साथ सम्मान करते थे। कहते हैं, केशवदास जी को इन्होंने एक बार छह लाख रुपये दिए थे और केशवदास की पैरवी से ओरछा नरेश पर एक करोड़ का ज़ुर्माना मुआफ करा दिया था। इनके मरने पर अकबर ने यह सोरठा कहा था, -

दीन देखि सब दीन, एक न दीन्हों दुसह दुख।
सो अब हम कहँ दीन, कछु नहिं राख्यो बीरबल

  • इनकी कोई पुस्तक नहीं मिलती है, पर कई सौ कवित्तों का एक संग्रह भरतपुर में है। इनकी रचना अलंकार आदि काव्यांगों से पूर्ण और सरस होती थी। कविता में ये अपना नाम ब्रह्म रखते थे।

उछरि उछरि भेकी झपटै उरग पर,
उरग पै केकिन के लपटै लहकि हैं।
केकिन के सुरति हिए की ना कछू है, भए,
एकी करी केहरि, न बोलत बहकि है।
कहै कवि ब्रह्म वारि हेरत हरिन फिरैं,
बैहर बहत बड़े ज़ोर सो जहकि हैं।
तरनि कै तावन तवा सी भई भूमि रही,
दसहू दिसान में दवारि सी दहकि है

पूत कपूत, कुलच्छनि नारि, लराक परोसि, लजायन सारो।
बंधु कुबुद्धि , पुरोहित लंपट, चाकर चोर, अतीथ धुतारो
साहब सूम, अड़ाक तुरंग, किसान कठोर, दीवान नकारो।
ब्रह्म भनै सुनु साह अकब्बर बारहौं बाँधि समुद्र में डारौ

कविराय पद

बीरबल हिन्दी की अच्छी कविताएँ करते थे, इससे पहले इनको कविराय (जो मलिकुश्शोअरा अर्थात् कवियों के राजा के प्राय: बराबर है) की पदवी मिली थी। 18वें वर्ष जब बादशाह ने नगरकोट के राजा जयचन्द पर क्रुद्ध होकर उसे क़ैद कर लिया, तब उसका पुत्र विधिचन्द्र (जो अल्पवयस्क था) अपने को उसका उत्तराधिकारी समझ कर विद्रोही हो गया। बादशाह ने वह प्रान्त कविराय को (जिसकी जागीर पास ही थी) दे दी और पंजाब के सूबेदार हुसैन कुली ख़ाँ ख़ानेजहाँ को आज्ञापत्र भेजा कि उस प्रान्त के सरदारों के साथ वहाँ जाकर नगरकोट विधिचन्द्र से छीनकर कविराय के अधिकार में दे दे। इन्हें राजा बीरबल (जिसका अर्थ बहादुर है) की पदवी देकर उस कार्य पर नियत किया।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 1.3 पुस्तक- 'मुग़ल दरबार के सरदार' भाग-1| लेखक: मआसिरुल् उमरा | प्रकाशन: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी | पृष्ठ संख्या: 127-130
  2. दरबारी अकबरी में (पृ. 295) उपनाम बुर्हिया लिखा है। बदायूँनी लो कृत अनु. पृ. 161) में ब्रह्मदास है। मआसिरुल्उमरा के सम्पादकों ने बरहन: (नंगा) लिखा है। यह सब फ़ारसी लिपि की माया मात्र है। वास्तव में ब्रह्म ही ठीक है। मिश्रबंधुविनोद (सं. 77, भाग 1, पृ. 296-8) में इनकी कविता का उद्धरण दिया हुआ है।
  3. पुस्तक- भारत ज्ञानकोश खंड-4 |प्रकाशन- एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका| पृष्ठ संख्या- 26
  4. (बदायूंनी, लो, पृ. 164)
  5. (प्रशंसा बेचने वाले)
  6. जो पेशावर के उत्तर और बाजौर के पश्चिम है, चालीस कोस लम्बा और पाँच से पंद्रह कोस तक चौड़ा है और जिसमें चालीस सहस्र मनुष्य उस जाति के बसते थे
  7. अकबरनामा, इलि. डाउ., जि. 5, पृष्ठ. 80-84 में विस्तृत विवरण दिया है।
  8. जुब्दतुत्तवारीख, इलि. डाउ., जि. 5, पृ. 191 में इसी प्रकार यह घटना लिखी गई है।
  9. यह आश्चर्य की बात है कि अकबर का इतना प्रिय व्यक्ति को केवल दो हज़ारी मन्सब मिला हुआ था जो इतिहासकारों की समझ में नहीं आता है।
  10. राजा बीरबल की मृत्यु के अनंतर उनके जीवित रहने की झूठी गप्पों का वर्णन बदायूनी ने विस्तार से लिखा है (देखिए मुंत्तखबुत्तवारीख बिब. इंडि. सं. पृ. 357-58)।
  11. दरबारी अकबरी में (पृ. 295) उपनाम बुर्हिया लिखा है। बदायूँनी लो कृत अनु. पृ. 161) में ब्रह्मदास है। मआसिरुल्उमरा के सम्पादकों ने बरहन: (नंगा) लिखा है। यह सब फ़ारसी लिपि की माया मात्र है। वास्तव में ब्रह्म ही ठीक है। मिश्रबंधुविनोद (सं. 77, भाग 1, पृ. 296-8) में इनकी कविता का उद्धरण दिया हुआ है।
  12. दूसरे पुत्र का हरिहरराय नाम था जिसका अकबरनामा जि. 3, पृष्ठ. 820 में इस प्रकार उल्लेख है कि वह दक्षिण से शहज़ादा दानियाल का पत्र लाया था।

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