काका हाथरसी  

काका हाथरसी
काका हाथरसी
पूरा नाम प्रभुलाल गर्ग उर्फ़ काका हाथरसी
जन्म 18 सितंबर, 1906
जन्म भूमि हाथरस, उत्तर प्रदेश
मृत्यु 18 सितंबर, 1995
अभिभावक शिवलाल गर्ग और बरफ़ी देवी
पति/पत्नी रतन देवी
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र हास्य कवि, लेखक
मुख्य रचनाएँ 'काका की फुलझड़ियाँ', 'काका के प्रहसन', 'लूटनीति मंथन करि', 'खिलखिलाहट' आदि।
भाषा हिन्दी
पुरस्कार-उपाधि 'कला रत्न' (1966), 'पद्म श्री' (1985), 'आनरेरी सिटीजन' (1989)
प्रसिद्धि हास्य कवि
विशेष योगदान 1932 में काका ने हाथरस में संगीत की उन्नति के लिये 'गर्ग ऐंड कम्पनी' की स्थापना की, जिसका नाम बाद में 'संगीत कार्यालय हाथरस' हुआ।
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी आपके नाम से चलाया गया 'काका हाथरसी पुरस्कार' प्रतिवर्ष एक सर्वश्रेष्ठ हास्य कवि को प्रदान किया जाता है।
इन्हें भी देखें कवि सूची, साहित्यकार सूची
काका हाथरसी की रचनाएँ

काका हाथरसी (अंग्रेज़ी:Kaka Hathrasi) (वास्तविक नाम- प्रभुलाल गर्ग, जन्म- 18 सितंबर, 1906, हाथरस, उत्तर प्रदेश; मृत्यु- 18 सितंबर, 1995) भारत के प्रसिद्ध हिन्दी हास्य कवि थे। उन्हें हिन्दी हास्य व्यंग्य कविताओं का पर्याय माना जाता है। काका हाथरसी की शैली की छाप उनकी पीढ़ी के अन्य कवियों पर तो पड़ी ही थी, वर्तमान में भी अनेक लेखक और व्यंग्य कवि काका की रचनाओं की शैली अपनाकर लाखों श्रोताओं और पाठकों का मनोरंजन कर रहे हैं। उनकी रचनाएँ समाज में व्याप्त दोषों, कुरीतियों, भ्रष्टाचार और राजनीतिक कुशासन की ओर सबका ध्यान आकृष्ट करती हैं। भले ही काका हाथरसी आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी हास्य कविताए, जिन्हें वे 'फुलझडियाँ' कहा करते थे, सदैव हमे गुदगुदाती रहेंगी।

जीवन परिचय

काका हाथरसी का जन्म 18 सितंबर, 1906 ई. में उत्तर प्रदेश के हाथरस ज़िले में हुआ था। उनके पिता का नाम शिवलाल गर्ग और माता का नाम बरफ़ी देवी था। जब वे मात्र 15 दिन के थे, तभी प्लेग की महामारी ने उनके पिता को छीन लिया और परिवार के दुर्दिन आरम्भ हो गये। भयंकर ग़रीबी में भी काका ने अपना संघर्ष जारी रखते हुए छोटी-मोटी नौकरियों के साथ ही कविता रचना और संगीत शिक्षा का समंवय बनाये रखा।[1]

दिन अट्ठारह सितंबर, अग्रवाल परिवार। उन्नीस सौ छ: में लिया, काका ने अवतार।[1]

परिवार

काका हाथरसी के प्रपितामह गोकुल, महावन से आकर हाथरस में बस गए थे और यहाँ उन्होंने बर्तन-विक्रय का काम (व्यापार) प्रारम्भ किया था। बर्तन के व्यापारी को उन दिनों 'कसेरे' कहा जाता था। पितामह (बाबा) श्री सीताराम कसेरे ने अपने पिता के व्यवसाय को नियमित रूप से चलायमान रखा। उसके बाद बँटवारा होने पर बर्तन की दुकान परिवार की दूसरी शाखा पर चली गईं। परिणामत: काका जी के पिता को बर्तनों की एक दुकान पर मुनीमगीरी करनी पड़ी।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 मेरा जीवन ए-वन (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) भारतीय साहित्य संग्रह। अभिगमन तिथि: 21 अक्टूबर, 2011।
  2. 2.0 2.1 2.2 2.3 कुछ ऐसा था काका हाथरसी का जुनून (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 13 जून, 2013।
  3. काका हाथरसी का जन्मदिन और पुण्यतिथि (18 सितम्बर) (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) सर्वश्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉग सूची। अभिगमन तिथि: 21 अक्टूबर, 2011।

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