रंगभरनी एकादशी  

रंगभरनी एकादशी
होली खेलते हुए लोग
विवरण 'रंगभरनी एकादशी' का हिन्दू धर्म में बड़ा ही महत्त्व है। उत्तर प्रदेश के कई स्थानों पर इसी दिन से 'होली' प्रारम्भ हो जाती है।
अनुयायी समस्त हिन्दू तथा प्रवासी भारतीय
तिथि फाल्गुन, शुक्ल पक्ष की एकादशी
धार्मिक मान्यता माना जाता है कि इसी दिन शिव पार्वती से विवाह के पश्चात् पहली बार अपनी प्रिय नगरी काशी आये थे। रंगभरनी एकादशी का पर्व काशी में माँ पार्वती के प्रथम स्वागत का प्रतिक है।
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अन्य जानकारी 'रंगभरी एकादशी' का काशी में विशेष महत्त्व है। इस दिन बाबा विश्वनाथ का विशेष एवं भव्य श्रृंगार होता है, जो प्रतिवर्ष केवल रंगभरी एकादशी, दीपावली, अन्नकूट तथा महाशिवरात्रि पर ही होता है।

रंगभरनी एकादशी प्रत्येक वर्ष फाल्गुन माह में शुक्ल पक्ष की एकादशी को कहा जाता है। इसी दिन 'आमलकी एकादशी' भी मनाई जाती है। यह एकादशी श्री विश्वेश्वर भगवान 'काशीविश्वनाथ' के लिए क्रीड़ा का पर्व है। ऐसा माना जाता है कि इसी दिन भगवान शिव माता पार्वती के साथ काशी पहुँचे थे। इसी कारणवश इस दिन काशी में 'होली' का पर्वकाल प्रारंभ हो जाता है।

महत्त्व

पौराणिक परम्पराओं और मान्यताओं के अनुसार फाल्गुन की शुक्ल पक्ष की एकादशी को बड़ा महत्त्व दिया जाता है। इस एकादशी को 'रंगभरनी एकादशी' एवं 'आमलकी एकादशी' कहते हैं। इस एकादशी की विशेषता के तीन मुख्य कारण हैं[1]-

  1. माना जाता है कि इसी दिन शिव पार्वती से विवाह के पश्चात् पहली बार अपनी प्रिय नगरी काशी आये थे। रंगभरनी एकादशी का पर्व काशी में माँ पार्वती के प्रथम स्वागत का प्रतिक है।
  2. मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान विष्णु ने सृष्टि की रचना हेतु ब्रह्मा जी एवं आंवले के वृक्ष को जन्म दिया था।
  3. एक अन्य मान्यतानुसार इसी दिन श्याम बाबा का मस्तक पहली बार श्याम कुंड में प्रकट हुआ था। इसलिए इस दिन लाखों श्याम भक्त श्याम दर्शन हेतु खाटू जाते हैं।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 क्यों है फाल्गुन शुक्ल एकादशी इतनी विशेष (हिन्दी) ऑनलाइन प्रसाद.कॉम। अभिगमन तिथि: 04 मार्च, 2015।

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