मिथुन संक्रान्ति  

मिथुन संक्रान्ति को भारत के पूर्वी और पूर्वोत्तर प्रांतों में माता पृथ्वी के वार्षिक मासिक धर्म चरण के रूप में मनाया जाता है, जिसे 'राजा पारबा' या 'अंबुबाची मेला' के नाम से जानते हैं। मिथुन संक्रांति उन 12 राशियों में एक है जिसमें सूर्य अलग अलग राशि नक्षत्र पर विराज होता है। इस संक्रांति में दान दक्षिणा, स्नान व पूण्य कमाने का बहुत महत्व रहता है। मिथुन संक्रांति से सौरमण्डल में बहुत बड़ा बदलाव आता है यानि मिथुन संक्रांति के बाद से ही वर्षा होने जल जाती है, जिसे हम वर्षा ऋतु कहते हैं। यह वह दिन होता है जब सूर्य वृषभ राशि से बार निकलकर मिथुन राशि में प्रवेश कर लेता है और सारी राशियों में नक्षत्र की दिशा बदलती जाती है। सूर्य में आए बदलाव को बहुत बड़ा माना जाता है। यहीं कारण है कि इस दिन पूजा अर्चना का विशेष महत्व भी होता है।

सूर्य पूजा का महत्त्व

हिंदू पंचांग के अनुसार मिथुन संक्रांति सौर माह के तीसरे महीने आषाढ़ में आती है। इस महीने वर्षा होती है और इस माह के देवता सूर्य होते हैं। ऐसे में इस मिथुन संक्रांति के त्योहार का महत्व होता है। जो भी व्यक्ति संक्रांति के दिन सुबह जल्द उठकर भगवान सूर्य को जल चढ़ाता है और पूजा पाठ करता है, सूर्य देव उनको निरोगी रहने का आशीर्वाद देते हैं। जो भी व्यक्ति सूर्य के मिथुन संक्रांति पर लाल कपड़े, लाल चंदन, लाल फूल और तांबे के बर्तन का उपयोग कर सूर्य की पूजा करता है, उसके घर में सुख और संपन्नता का वास होता है। पूजा के बाद इस दिन दान करने से हर मनोकामना पूरी होती है। 

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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