रविदास जयंती

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रविदास जयंती
संत रविदास
विवरण रविदास जी के जन्म को 'रविदास जयंती' के रूप में मनाया जाता है। जातिवाद और अंधविश्वास के विरुद्ध काम करने के कारण रविदास पूजनीय हैं।
तिथि माघ पूर्णिमा
विशेष रविदास जी की 41 कविताओं को सिक्खों के पांचवे गुरु अर्जुन देव ने पवित्र ग्रंथ 'आदिग्रंथ' या 'गुरुग्रंथ साहिब' में शामिल कराया था।
योगदान रविदास जी महान संत और समाज सुधारक थे। भक्ति, सामाजिक सुधार, मानवता के योगदान में उनका जीवन समर्पित रहा।
संबंधित लेख रैदास, मीराबाई, गुरुग्रंथ साहिब, गुरु अर्जुन देव
अन्य जानकारी 'मन चंगा तो कठौती में गंगा' रविदास जी का ये दोहा आज भी प्रसिद्ध है। रविदास जी का कहना था कि "शुद्ध मन और निष्ठा के साथ किए काम का हमेशा अच्छा परिणाम मिलता है"।

संत रविदास जयंती (अंग्रेज़ी: Sant Ravidas Jayanti) हिंदू पंचांग के अनुसार हर साल माघ पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। यह रैदास पंथ का वार्षिक केंद्र बिंदु है। इस दिन गुरु रविदास जी की अमृतवाणी पढ़ी जाती है और गुरु के चित्र के साथ नगर में एक संगीत कीर्तन जुलूस निकाला जाता है। इसके अलावा श्रद्धालु पूजन करने के लिए नदी में पवित्र डुबकी लगाते हैं। उसके बाद भवन में लगी संत रविदास की छवि पूजी जाती है। हर साल गुरु रविदास जन्म स्थान मंदिर, सीर गोवर्धनपुर, वाराणसी में एक भव्य उत्सव के अवसर पर दुनिया भर से लाखों श्रद्धालुओं आते हैं।

मन चंगा तो कठौती में गंगा

भारत में कई संतों ने लोगों को आपसी प्रेम, सौहार्द और गंगा जमुनी तहजीब सिखाई। इन्हीं में एक थे संत रविदास, जिनका भक्ति आंदोलन और समाज सुधार में विशेष योगदान रहा। संत गुरु रविदास भारत के महान संतों में से एक थे, जिन्होंने अपना जीवन समाज सुधार कार्य के लिए समर्पित कर दिया। समाज से जाति विभेद को दूर करने में रविदास जी का महत्वपूर्ण योगदान रहा। वह ईश्वर को पाने का एक ही मार्ग जानते थे और वह मार्ग था- ‘भक्ति’। इसलिए उनका एक मुहावरा आज भी बहुत प्रसिद्ध है कि- ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’।

रविदास जी का जन्म

संत रविदास के जन्म को लेकर कई मत हैं लेकिन उनके जन्म पर एक दोहा खूब प्रचलित है-

चौदस सो तैंसीस कि माघ सुदी पन्दरास, दुखियों के कल्याण हित प्रगटे श्री गुरु रविदास

इस पंक्ति के अनुसार गुरु रविदास का जन्म माघ मास की पूर्णिमा को रविवार के दिन 1433 ई. को हुआ था। इसलिए हर साल माघ मास की पूर्णिमा तिथि को रविदास जयंती के रूप में मनाया जाता है।[1]

रविदास जी का जन्म 15वीं शताब्दी में उत्तर प्रदेश के वाराणसी में एक मोची परिवार में हुआ। उनके पिताजी जाति के अनुसार जूते बनाने का पारंपरिक पेशा करते थे, जो कि उस काल में निम्न जाति का माना जाता था, लेकिन अपनी सामान्य पारिवारिक पृष्ठभूमि के बावजूद भी रविदास जी भक्ति आंदोलन, हिंदू धर्म में भक्ति और समतावादी आंदोलन में एक प्रमुख व्यक्ति के रूप में उजागर हुए। 15वीं शताब्दी में रविदास जी द्वारा चलाया गया भक्ति आंदोलन उस समय का एक बड़ा आध्यात्मिक आंदोलन था।

मान्यता

मान्यता है कि संत रविदास जी के माता-पिता चर्मकार थे। उनके पिता का नाम संतोखदास (रग्घु) और माता का नाम करमा देवी (कलसा) था। वहीं उनकी पत्नी का नाम लोना और पुत्र का नाम श्रीविजयदास बताया जाता है। रविदास जी ने अपनी आजीविका के लिए पैतृक कार्य को अपनाया, लेकिन उनके मन में भगवान की भक्ति पूर्व जन्म के पुण्य से ऐसी रची बसी थी कि आजीविका को धन कमाने का साधन बनाने की बजाय संत सेवा का माध्यम बना लिया।[2]

रविदास जी के बारे में कहा जाता है कि बचपन से ही उनके पास अलौकिक शक्तियां थीं। बचपन में अपने दोस्त को जीवन देने, पानी पर पत्थर तैराने, कुष्ठ रोगियों को ठीक करने समेत उनके चमत्कार के कई किस्से प्रचलित हैं। संत रविदास अपना अधिकांश समय भगवान की पूजा में लगाते थे और धार्मिक परंपराओं का पालन करते हुए उन्होंने एक संत का दर्जा प्राप्त किया। 'मन चंगा तो कठौती में गंगा' रविदास जी का ये दोहा आज भी प्रसिद्ध है। रविदास जी का कहना था कि "शुद्ध मन और निष्ठा के साथ किए काम का हमेशा अच्छा परिणाम मिलता है"।

योगदान

संत शिरोमणि श्री गुरु रविदास जी एक महान संत और समाज सुधारक थे। भक्ति, सामाजिक सुधार, मानवता के योगदान में उनका जीवन समर्पित रहा।

धार्मिक योगदान- भक्ति और ध्यान में गुरु रविदास का जीवन समर्पित रहा। उन्होंने भक्ति के भाव से कई गीत, दोहे और भजनों की रचना की, आत्मनिर्भरता, सहिष्णुता और एकता उनके मुख्य धार्मिक संदेश थे। हिंदू धर्म के साथ ही सिक्ख धर्म के अनुयायी भी गुरु रविदास के प्रति श्रद्धा भाव रखते हैं। गुरु रविदास जी की 41 कविताओं को सिक्खों के पांचवे गुरु अर्जुन देव ने पवित्र ग्रंथ 'आदिग्रंथ' या 'गुरुग्रंथ साहिब' में शामिल कराया था।

सामाजिक योगदान- समाज सुधार में भी गुरु रविदास जी का विशेष योगदान रहा। इन्होंने समाज से जातिवाद, भेदभाव और समाजिक असमानता के खिलाफ होकर समाज को समानता और न्याय के प्रति प्रेरित किया।[1]

शिक्षा और सेवा- गुरु रविदास जी ने शिक्षा के महत्व पर जोर दिया और अपने शिष्यों को उच्चतम शिक्षा पाने के लिए प्रेरित किया। अपने शिष्यों को शिक्षत कर उन्होंने शिष्यों को समाज की सेवा में समर्थ बनाने के लिए प्रेरित किया। मध्य काल की प्रसिद्ध संत मीराबाई भी रविदास जी को अपना आध्यात्मिक गुरु मानती थीं।

जयंती

रविदास जी के जन्म को 'रविदास जयंती' के रूप में मनाया जाता है। जातिवाद और अंधविश्वास के खिलाफ काम करने के कारण गुरु रविदास जी पूजनीय हैं। वह एक आध्यात्मिक व्यक्ति थे। उनकी जयन्ती के दिन उनके अनुयायी पवित्र नदियों में स्नान करते हैं। फिर वे अपने जीवन से जुड़ी महान घटनाओं और चमत्कारों को याद करके अपने गुरु रविदास जी से प्रेरणा लेते हैं। उनके भक्त उनके जन्म स्थान पर जाते हैं और रविदास जयंती पर उनका जन्मदिन मनाते हैं।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 संत शिरोमणि गुरु रविदास कौन थे, समाज के लिए क्या है इनका योगदान (हिंदी) abplive.com। अभिगमन तिथि: 24 फ़रवरी, 2024।
  2. संत रविदास जयंती आज (हिंदी) amarujala.com। अभिगमन तिथि: 24 फ़रवरी, 2024।

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