गंधर्व नगर  

गंधर्व नगर का संस्कृत साहित्य में अनेक स्थानों पर उल्लेख मिलता है। वाल्मीकि रामायण[1] में लंका के सुंदर स्वर्ण-प्रसादों की तुलना गंधर्व नगर से की गई है-

'प्रासादमालाविततां स्तंभकांचनसनिभै:, शातकुंभनिभैर्जालैगंधर्वनगरोपमाम्।'
'गंधर्वनगराकारं तथैवांहिंतंपुन:।'

अर्थात् "वे ऋषि फिर गंधर्व नगर के समान वहीं एकाएक तिरोहित हो गए।"

  • इसी महाकाव्य में वर्णित है कि उत्तरी हिमालय के प्रदेश में अर्जुन ने गंधर्व नगर को देखा था, जो कभी तो भूमि के नीचे गिरता था, कभी पुन: वायु में स्थित हो जाता था। कभी वक्रगति से चलता हुआ प्रतीत होता था, तो कभी जल में डूब-सा जाता था-

'अन्तर्भूमौ निपतति पुनरूर्ध्व प्रतिष्ठते, पुनस्तिर्यक् प्रयात्याशु पुनरप्सु निमज्जति।'[3]

'यथा गंधर्वनगराणि दूरतो दृश्यन्ते उपसृत्य च नोपलभ्यन्ते।'

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. सुंदरकांड 2, 49
  2. आदिपर्व 126, 25
  3. वनपर्व 173, 27.
  4. श्रीमद्भागवत 5, 14, 5.
  5. वृहत्संहिता 30, 2.
  6. ऐतिहासिक स्थानावली |लेखक: विजयेन्द्र कुमार माथुर |प्रकाशक: राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर |पृष्ठ संख्या: 268 |

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