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पतंजलि (महाभाष्यकार) - भारतकोश, ज्ञान का हिन्दी महासागर

पतंजलि (महाभाष्यकार)  

Disamb2.jpg पतंजलि एक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- पतंजलि

पतंजलि या 'पतञ्जलि' ‘व्याकरण महाभाष्य’ के रचयिता हैं। इनकी गणना भारत के अग्रगण्य विद्वानों में की जाती है। इनका निवास स्थान 'गोनार्द' नामक ग्राम (कश्मीर) अथवा 'गोंडा' (उत्तर प्रदेश) माना जाता है। इनकी माता का नाम 'गोणिका' बताया गया है तथा इनके पिता का नाम ज्ञात नहीं है।

जीवन परिचय

महर्षि पाणिनि के लगभग दो सौ साल बाद कात्यायन महर्षि ने लगभग बारह सौ सूत्रों पर वार्तिक लिखे। पाणिनि पर यही सबसे पुरानी टीका आज उपलब्ध है। इन वार्तिकों में सूत्रार्थ की चर्चा, कहीं मंडन और कभी-कभी खंडन भी किया गया है। फिर छ: सौ साल के बाद पतंजलि ने पाणिनि के सूत्रों का विवेचन करने वाली एक विस्तृत टीका लिखी। यही टीका 'व्याकरण महाभाष्य' के नाम से प्रसिद्ध है। जिन सूत्रों पर कात्यायन के वार्तिक हैं, उन सबका और जिन पर वार्तिक नहीं हैं, ऐसे लगभग 400 सूत्रों का इसमें विवेचन है। इससे यह स्पष्ट होता है कि सामान्यत: अष्टाध्यायी के 40 प्रतिशत सूत्रों का इस टीका में विवेचन है। सम्भव है कि अवशिष्ट 2400 सूत्रों का अर्थात् अष्टाध्यायी के 60 प्रतिशत सूत्रों का विवेचन करने की आवश्यकता पतंजलि को प्राप्त नहीं हुई। अंतरंग और बहिरंग साक्ष्य से ई. पू. 150 पतंजलि का काल अध्येताओं ने निश्चित किया है।

पतंजलि का समय

बहुसंख्य भारतीय व पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार पतंजलि का समय 150 ई. पू. है, पर युधिष्ठिर मीमांसकजी ने ज़ोर देकर बताया है कि पतंजलि विक्रम संवत से दो हज़ार वर्ष पूर्व हुए थे। इस सम्बन्ध में अभी तक कोई निश्चित प्रमाण प्राप्त नहीं हो सका है, पर अंत:साक्ष्य के आधार पर इनका समय निरूपण कोई कठिन कार्य नहीं है। महाभाष्य के वर्णन से पता चलता है कि पुष्यमित्र ने किसी ऐसे विशाल यज्ञ का आयोजन किया था, जिसमें अनेक पुरोहित थे और जिनमें पतंजलि भी शामिल थे। वे स्वयं ब्राह्मण याजक थे और इसी कारण से उन्होंने क्षत्रिय याजक पर कटाक्ष किया है- यदि भवद्विध: क्षत्रियं याजयेत्।[1]

पुष्यमित्रों यजते, याजका: याजयति। तत्र भवितव्यम् पुष्यमित्रो याजयते, याजका: याजयंतीति यज्वादिषु चाविपर्यासो वक्तव्य:।[2]

इससे पता चलता है कि पतंजलि का आभिर्भाव कालिदास के पूर्व व पुष्यमित्र के राज्य काल में हुआ था। ‘मत्स्य पुराण’ के अनुसार पुष्यमित्र ने 36 वर्षों तक राज्य किया था। पुष्यमित्र के सिंहासन पर बैठने का समय 185 ई. पू. है और 36 वर्ष कम कर देने पर उसके शासन की सीमा 149 ई. पू. निश्चित होती है। गोल्डस्टुकर ने महाभाष्य का काल 140 से 120 ई. पू. माना है। डॉक्टर भांडारकर के अनुसार पतंजलि का समय 158 ई. पू. के लगभग है, पर प्रोफ़ेसर वेबर के अनुसार इनका समय कनिष्क के बाद, अर्थात् ई. पू. 25 वर्ष होना चाहिए। डॉक्टर भांडारकर ने प्रोफ़ेसर वेबर के इस कथन का खंडन कर दिया है। बोथलिंक के मतानुसार पंतजलि का समय 2000 ई. पू. है।[3] इस मत का समर्थन मेक्समूलर ने भी किया है। कीथ के अनुसार पतंजलि का समय 140-150 ई. पू. है।[4]

जन्म कथा

पतंजलि के अन्य नाम भी हैं, जैसे-गोनर्दीय, गोणिकापुत्र, नागनाथ, अहिपति, चूर्णिकार, फणिभुत, शेषाहि, शेषराज और पदकार। रामचन्द्र दीक्षित ने 'पंतजलिचरित' नामक उनका चरित्र लिखा है, जिसमें पतंजलि को शेष का अवतार मानकर, तत्सम्बन्धी निम्न आख्यायिका दी गई है-

एक बार जब श्री विष्णु शेषशय्या पर निद्रित थे, भगवान शंकर ने अपना तांडव नृत्य प्रारम्भ किया। उस समय श्री विष्णु गहरी निद्रा में नहीं थे। अत: स्वाभाविकत: उनका ध्यान उस शिव नृत्य की ओर आकर्षित हुआ। उस नृत्य को देखते हुए श्री विष्णु को इतना आनन्द प्राप्त हुआ कि, वह उनके शरीर में समाता नहीं था। अत: उन्होंने अपने शरीर को बढ़ाना प्रारम्भ कर दिया। श्री विष्णु का शरीर वृद्धिगत होते ही शेष को उनका भार असहनीय हो उठा। वे अपने सहस्र मुखों से फुंकार करने लगे। उसके कारण लक्ष्मी जी घबराईं और उन्होंने श्री विष्णु को नींद से जगाया। उनके जागने पर ही उनका शरीर संकुचित हुआ। तब छुटकारे की श्वांस लेते हुए शेष ने पूछा, 'क्या आज मेरी परीक्षा लेना चाहते थे।' इस पर श्री विष्णु ने शेष को शिवजी के तांडव नृत्य का कलात्मक श्रेष्ठत्व विशद करके बताया। तब शेष बोले-'वह नृत्य एक बार मैं देखना चाहता हूँ।' इस पर श्री विष्णु ने कहा-'तुम एक बार पुन: पृथ्वी पर अवतार लो, उसी अवतार में तुम शिवजी का तांडव नृत्य देख सकोगे।'

जन्म स्थान पर मतभेद

पतंजलि के जन्म स्थान के बारे में भी विद्वानों का एक मत नहीं है। पतंजलि ने कात्यायन को 'दाक्षिणात्य' कहा है। इससे अनुमान होता है, कि वे उत्तर भारत के निवासी रहे होंगे। उनके जन्म-ग्राम के रूप में गोनर्द ग्राम का नामोल्लेख हो चुका है। किन्तु गोनर्द का सम्बन्ध गोंड प्रदेश से भी मानते हैं। कतिपय पंडितों के मतानुसार गोनर्द ग्राम अवध प्रदेश का गोंडा होगा। वेबर इस गांव को मगध के पूर्व में स्थित मानते हैं। कनिंघम के अनुसार, गोनर्द गौड हैं, किन्तु पतंजलि आर्यावर्त का अभिमान रखने वाले थे। अत: उनका जन्म-ग्राम, आर्यावर्त ही में कहीं न कहीं होना चाहिए, इसमें संदेह नहीं। उस दृष्टि से वह गोनर्द, विदिशा और उज्जैन के बीच किसी स्थान पर होना चाहिए। प्रोफ़ेसर सिल्व्हां लेव्ही भी गोनर्द को विदिशा व उज्जैन के मार्ग पर ही मानते हैं। उन्होंने यह भी बताया है कि विदिशा के समीप स्थित सांची के बौद्ध स्तूप को, आसपास के प्राय: सभी गांवों के लोगों द्वारा दान दिए जाने के उल्लेख मिलते हैं, किन्तु उसमें गोनर्द के लोगों के नाम दिखाई नहीं देते।

इस बात पर उन्होंने आश्चर्य भी व्यक्त किया है। तथापि इस पर से अनुमान निकलता है कि गोनर्द के लोग कट्टर बौद्ध विरोधक होंगे। ऐसे बौद्ध विरोधकों के केन्द्र में पतंजलि पले यह घटना उनके चरित्र की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। व्याकरण-महाभाष्य से यह सूचित होता है, कि पतंजलि की मौर्य सम्राट बृहद्रथ का वध कराने वाले पुष्यमित्र शुंग से मित्रता थी। पतंजलि ने व्याकरण की परीक्षा पाटलिपुत्र (पटना) में दी। वहीं पर उन दोनों की मित्रता हुई होगी। बौद्ध बनकर वैदिक धर्म का विरोध करने वाले मौर्य वंश का उच्छेद कर भारत में वैदिक धर्मी राज्य की प्रस्थापना करने की योजना उन दोनों ने वहीं पर बनाई होगी।

नामकरण

तदनुसार अवतार लेने हेतु उचित स्थान की खोज में शेष जी चल पड़े। चलते-चलते गोनर्द नामक स्थान पर उन्हें गोणिका नामक एक महिला, पुत्र प्राप्ति की इच्छा से तपस्या करती हुई दीख पड़ी। शेष जी ने उसे मातृ रूप में स्वीकार करने का मन ही मन निश्चय किया। अत: जब गोणिका सूर्य को अर्ध्य देने हेतु सिद्ध हुई, तब शेष जी सूक्ष्म रूप धारण उसकी अंजलि में जा बैठै और उसकी अंजलि के जल के साथ नीचे आते ही, उसके सम्मुख बालक के रूप में खड़े हो गए। गोणिका ने उन्हें अपना पुत्र मानकर गोदी में उठा लिया और बोली-‘मेरी अंजलि से पतन पाने के कारण, मैं तुम्हारा नाम पतंजलि रखती हूँ।’

अध्यापन कार्य

पतंजलि ने बाल्यावस्था से ही विद्याभ्यास प्रारम्भ किया। फिर तपस्या के द्वारा उन्होंने शिव जी को प्रसन्न कर लिया। शिव जी ने उन्हें चिदम्बर क्षेत्र में अपना तांडव नृत्य दिखलाया और पदशास्त्र पर भाष्य लिखने का आदेश दिया। तदनुसार चिदम्बरम् में ही रहकर पतंजलि ने पाणिनि के सूत्रों तथा कात्यायन के वार्तिकों पर विस्तृत भाष्य की रचना की। यह ग्रन्थ ‘पातंजल महाभाष्य’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस महाभाष्य की कीर्ति सुनकर, उसके अध्ययनार्थ हज़ारों पंडित पतंजलि के यहाँ पर आने लगे। पतंजलि एक यवनिका (पर्दे) की ओट में बैठकर, शेषनाग के रूप में उन सहस्रों शिष्यों को एक साथ पढ़ाने लगे।

अध्यापन के समय पंतजलि ने शिष्यों को कड़ी चेतावनी दे रखी थी, कि कोई भी यवनिका के अन्दर झांककर न देखे, किन्तु शिष्यों के हृदय में इस बारे से भारी कोतुहल जागृत हो चुका था, कि एक ही व्यक्ति एक ही समय में इतने शिष्यों को ग्रन्थ के अन्यान्य भाग किस प्रकार पढ़ा सकता है। अत: एक दिन उन्होंने जब यवनिका दूर की, तो उन्हें दिखाई दिया, कि पतंजलि सहस्र मुख वाले शेषनाग के रूप में अध्यापन कार्य कर रहे हैं, किन्तु शेष जी का तेज इतना प्रखर था कि सभी शिष्य जलकर भष्म हो गए। केवल एक शिष्य जो कि उस समय जल लाने के लिए बाहर गया था, बच गया। पतंजलि ने उसे आदेश दिया, कि वह सुयोग्य शिष्यों को महाभाष्य पढ़ाये। फिर पतंजलि चिदम्बर क्षेत्र से गोनर्द ग्राम लौटे।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

भागवत, पंडित वामन बा. विश्व के प्रमुख दार्शनिक (हिन्दी)। भारतडिस्कवरी पुस्तकालय: वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, नई दिल्ली, 271।

  1. (3-3-147, पृष्ठ संख्या 332)
  2. (महाभाष्य, 3-1-26)
  3. (पाणिनीज् ग्रामेटिक)
  4. सं.वा.को. (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 360-363
  5. उस वस्तु को पहचानने में इन्द्रियाँ असमर्थ सिद्ध होती हैं

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