उद्योतकर  

उद्योतकर एक दार्शनिक है। प्राचीन न्याय दर्शन के विकास में जिन नैयायिकों के नाम अग्रगण्य हैं, उनमें उद्योतकर एक हैं। उद्योतकर दिङ्नाग तथा प्रशस्तवाद के पश्चात् हुए, यह निश्चित है। धर्मकीर्ति से उद्योतकर का क्या संबंध था, इस बारे मे विद्वानों में मतभेद हैं। कई विद्वानों ने[1] ऐसा माना है कि उद्योतकर धर्मकीर्ति के पश्चात् हुए। लेकिन न्यायवार्तिक में जो बौद्धों के बहुत सारे तर्कशास्त्र विषयक संदर्भ आते हैं, वे दिङनाग तथा वसुबंधु से ही लिए हुए हैं। ऐसा कोई भी नहीं, जिसका धर्मकीर्ति से ही लिया जाना सिद्ध हो सके। इसलिए अधिकतर विद्वानों का यही कहना है कि धर्मकीर्ति के मत से उद्योतकर परिचित नहीं थे। संभवत: धर्मकीर्ति उद्योतकर के पश्चात् ही हुए। सुबंधुकृत 'वासवदत्ता' नामक आख्यायिका में 'न्यायस्थितिमिव उद्योतकरस्वरूपाम्' इस निर्दश से स्पष्ट है कि उद्योतकर सुबंधु से पहले हुए थे। इस तथा दूसरे प्रमाणों के आधार पर न्यायवार्तिक समय सातवीं सदी का पूर्वार्ध माना जा सकता है।

अन्य नाम

उद्योतकर का अन्य दो नामों से भी उल्लेख हुआ है। वाचस्पति मिश्र ने न्यायवार्तिकतात्पर्य टीका में उद्योतकर का निर्देश भारद्वाज नाम से किया है। गंगानाथ झा का मत है कि 'उद्योतकर' नाम उद्योतकर के भारद्वाज कुलोत्पन्न होने के कारण है। उद्योतकर को पाशुपताचार्य भी कहा गया है। शायद इस नाम के पीछे यह कारण है कि उद्योतकर शैव सम्प्रदाय के आचार्य थे।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

गोखले, डॉ. पी.पी. विश्व के प्रमुख दार्शनिक (हिन्दी)। भारतडिस्कवरी पुस्तकालय: वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, नई दिल्ली, 80।

  1. जैसे कि विद्याभूषण ने
  2. न्यायवार्तिक 1.1.5
  3. जो कि इन्द्रियस्वरूप, अचेतन है, ज्ञानस्वरूप नहीं है
  4. (सिर्फ शब्द का गौतमकृत लक्षण शब्द प्रमाण का ही है, शाब्दबोध का नहीं।)
  5. न्यायवार्तिक 9.9.5
  6. फल से अव्यवहितपूर्व होने वाला कारण
  7. न्यायवार्तिक 1.1.5
  8. न्यायवार्तिक 3.1.1
  9. जैसे सर्वाभिसमयसूत्र में पंचस्कंधों को भार, तथा पुद्गल को आत्मा का भारहार बताया गया है। आत्मा को न मानन की दृष्टि मिथ्या बतायी गई है।
  10. यह दूसरा अनुमान बहुत प्राचीन है, जिसका उद्योतकर ने उपयोग किया है।

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