थॉमस अक्वाइनस  

थॉमस अक्वाइनस

थॉमस अक्वाइनस इटली का एक महान् दार्शनिक था। थॉमस अक्वाइनस का जन्म नेपल्ज के निकट रोकासैका, (इटली) नामक स्थान में हुआ था। जन्म तिथि के सम्बन्ध में मतभेद है। सम्भवत: यह 1224 का अन्त हो या 1225 का प्रारम्भ। उनके पिता सम्मानित सामन्त थे। परिवार अभिजात वर्ग का था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा मॉन्टे कैसीनो में हुई थी। 1239 में उनका नामांकन नेपल्ज विश्वविद्यालय में हुआ। 1244 में उन्होंने पादरी वृत्ति स्वीकार कर ली। 1245 में वे अध्ययन हेतु पेरिस गए, जहाँ बाद में उन्होंने अध्यापन कार्य प्रारम्भ किया। 1259 में उन्हें पोप के निकट ही धर्म दर्शन के अध्यापन का कार्य मिला। प्राय: दस वर्षों तक वे इटली के विभिन्न धर्म केन्द्रों में अध्ययन-अध्यापन कार्य में रत रहे। 1268 से 1272 तक वे पुन: पेरिस विश्वविद्यालय से सम्बन्ध रहे। कहा जाता है कि 1273 में उन्हें रहस्यात्मक अनुभव प्राप्त हुए। 49 वर्ष की अवस्था में नेपल्ज में उनकी मृत्यु हुई।

आस्था एवं तर्कबुद्धि

संत थॉमस के पहले के ईसाई विचारकों (शायद संत ऑगस्टीन जैसे कुछ एक अपवादों को छोड़कर) की सामान्य धारणा थी कि बौद्धिकता के लिए धर्म में स्थान नहीं है, एक तो इस कारण कि शुद्ध बौद्धिक दृष्टिकोण आस्था के महत्त्व को नहीं समझ पाता, दूसरे इस कारण कि आस्था को तर्क बृद्धि के सहारे की आवश्यकता नहीं होती, जबकि ज्ञान की उपलब्धि के लिए आस्था आवश्यक है। किन्तु अक्वाइनस को आस्था एवं तर्क बुद्धि के बीच कोई विरोध या असंगति दिखाई नहीं दी। वे स्वीकार करते हैं कि कुछ मुख्य धार्मिक तत्त्व तर्क बुद्धि के द्वारा नहीं जाने जा सकते, उनका ज्ञान मूलत: रहस्यात्मक दिव्य अनुभव पर ही निर्भर होता है। किन्तु उनका कहना है कि ऐसे सत्व भी हैं, जिनका ज्ञान तर्क बुद्धि प्राप्त कर सकती है। आस्था एवं तर्क बुद्धि के स्वरूप तथा पारस्परिक सम्बन्ध को ध्यान में रखते हुए संत थॉमस ने तीन प्रकार के सत्यों का उल्लेख किया है-

  1. वे रहस्यात्मक दिव्य अनुभव जिनकी बौद्धिक उपलब्धि सम्भव नहीं है
  2. धर्म के सहज सत्य (जैसे, ईश्वर का अस्तित्व) जिनका रहस्यात्मक अनुभव भी सम्भव है और बौद्धिक ज्ञान भी
  3. कुछ ऐसे आनुभविक एवं वैज्ञानिक तथ्य जिनका स्पष्ट बौद्धिक ज्ञान सम्भव है।

वैसे संत थॉमस ईश्वर को ही सभी सत्यों का स्रोत मानते हैं। कुछ सत्य तो ईश्वर के द्वारा साक्षात् ढंग से प्रदत्त हैं- श्रुत (इलहामी) हैं, तथा कुछ सत्यों की जानकारी को हम ईश्वर के द्वारा दी गई शक्तियों के माध्यम से स्वयं प्राप्त करते हैं। संत थॉमस की भाषा में प्रथम ज्ञान ईश्वरीय है तथा दूसरा मानवीय। कुछ ऐसे भी ज्ञान सम्भव हैं जो एक दृष्टि से ईश्वरीय तथा दूसरी दृष्टि से मानवीय। ईश्वर का अस्तित्व उसी प्रकार का ज्ञान है। यह श्रुत (इलहामी) ज्ञान है, साथ ही इसकी स्थापना मानवीय ज्ञान के आधार पर बौद्धिक युक्तियों के द्वारा भी की जा सकती है। इस दृष्टि से भी ज्ञान के तीन ही रूप दिखाई देते हैं।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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