नरक  

नरक पौराणिक धर्म ग्रंथों और हिन्दू मान्यताओं के अनुसार वह स्थान है, जहाँ पापियों की आत्मा दंड भोगने के लिए भेजी जाती है। दंड का फल भोगने के पश्चात् कर्मानुसार उनका दूसरी योनियों में जन्म होता है। स्वर्ग धरती के ऊपर है तो नरक धरती के नीचे। सभी नरक धरती के नीचे यानी पाताल भूमि में हैं। नरक, स्वर्ग का विलोमार्थक है। विश्व की प्राय: सभी जातियों और धर्मों की आदिम तथा प्राचीन मान्यताओं के अनुसार नरक एक प्रकार का मरणोत्तर अधौलोक, स्थान या अवस्था है, जहाँ किसी देवता, देवदूत या राक्षस द्वारा अधर्मी, नास्तिक, पापी और अपराधी दुष्टात्माएँ दंडित किया जाता है।

लोक

नरक को 'अधोलोक' भी कहते हैं। 'अधोलोक' यानी 'नीचे का लोक'। 'ऊर्ध्व लोक' का अर्थ है- 'ऊपर का लोक' अर्थात् 'स्वर्ग'। मध्य लोक में हमारा ब्रह्मांड है। कुछ लोग इसे कल्पना भी मानते हैं तो कुछ लोग सत्य। ऐसा प्रसिद्ध है कि 'नरक' एक लोक है, जहाँ जीव अपने पापों का फल भोगता है। पाप का फल दुःख है। 'गरुड़पुराण' आदि के ज्ञान से प्रतीत होता है कि नरक लोक बहुत दूर नीचे की ओर एक स्थान है। यमराज के दूत पापी जीव को बाँधकर ले जाते हैं और नाना प्रकार की पीड़ा देते हैं। विभिन्न प्रकार के पापों के लिए नरक रूपी कारागार में तरह-तरह के दण्ड दिये जाते हैं। जीव को ये दण्ड भोगने के लिए यातना शरीर प्राप्त होता है। जीव बहुत कष्ट पाने पर भी उस शरीर को छोड़ नहीं पाता। यह काटने-छाटने से पीड़ा तो देता है, किन्तु नष्ट नहीं होता। नरक का वर्णन संसार के सभी सम्प्रदायों में किया गया है। इससे ज्ञात होता है कि नरक की अवधारणा मिथ्या नहीं है। यह मनुष्य को पाप कर्म से विरत करने के लिए मात्र डराने धमकाने की बात नहीं है।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. स्वर्ग और नरक (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 29 जुलाई, 2013।
  2. कितने और कहाँ होते हैं नरक (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 29 जुलाई, 2013।
  3. गीता अमृत -जोशी गुलाबनारायण, अध्याय 16, पृ.सं.-342, श्लोक 21 - त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं

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