उत्तंग  

महारानी मदयन्ती का उत्तंग को कुण्डल दान

उत्तंग महर्षि गौतम के प्रिय शिष्य थे। गौतम उनसे इतने प्रसन्न थे कि, उनके बाद आये अनेक शिष्यों को घर जाने की आज्ञा देकर भी उन्होंने उत्तंक को घर जाने की आज्ञा प्रदान नहीं की। उत्तंग की गुरु-भक्ति देखकर ऋषि ने अपनी कन्या का विवाह इनके साथ कर दिया था। शिक्षा पूरी करने के बाद जब उत्तंग ने गौतम ऋषि से गुरु दक्षिणा के संबंध में पूछा, तो गुरुपत्नी ने सौदास की पत्नी 'मदयंती' के कुंडल लाकर देने को कहा। सौदास नरभक्षी राक्षस था। उत्तंग निर्भय उसके पास पहुंचे। उत्तंग ने सौदास को आश्वासन दिया कि, कुंडल ऋषि की पत्नी को देकर वे सौदास का आहार बनने के लिए चले आएंगे। उत्तंग ने मदयंती के कुंडल प्राप्त कर लिए। लौटते समय जब वे मार्ग में भोजन के लिए रुकने रूके, तो तक्षक कुंडल चुराकर पाताल लोक चला गया। इस पर उत्तंग ने इंद्र की सहायता से पाताल लोक जाकर कुंडल प्राप्त किए और गुरुदक्षिणा चुकाई।

गुरु दक्षिणा

एक दिन उत्तंक जंगल से लकड़ियाँ लेकर आये, तो न केवल थक गये, अपितु लकड़ियों में उनके सफ़ेद बालों की लटाएँ फँसकर टूट गईं। अपने सफ़ेद बालों को देखकर उन्होंने रोना आरम्भ कर दिया। पिता की आज्ञा से गुरु पुत्री ने उनके आँसू पोंछे, तो उसके दोनों हाथ जल गये तथा वह भूमि से जा लगी। पृथ्वी भी उनके आँसू सम्भालने में असमर्थ थी। गौतम ने उनके दु:ख का कारण जाना, तो उन्हें घर जाने की आज्ञा दे दी तथा कहा कि, यदि वह सोलह वर्ष के हो जायें, तो वे अपनी पुत्री का विवाह उनसे कर देंगे। उत्तंक योगबल से सोलह वर्ष के हो गये तथा गुरुपुत्री से विवाह करके उन्होंने गौतम से गुरु दक्षिणा के विषय में पूछा। गौतम ने परम संतोष जताकर कुछ और लेने से इन्कार कर दिया। किन्तु उसकी पत्नी ने सौदास की पत्नी के कुंडल मांगे। सौदास शापवश राक्षस हो गया था तथापि उत्तंक उससे कुंडल लेने के लिए गये।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. महाभारत, आश्वमेधिकपर्व, अध्याय 52-58

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