शबरी  

शबरी

शबरी का उल्लेख रामायण में भगवान श्री राम के वन-गमन के समय मिलता है। शबरी को श्री राम के प्रमुख भक्तों में गिना जाता है। अपनी वृद्धावस्था में शबरी हमेशा श्री राम के आने की प्रतीक्षा करती रहती थी। राम उसकी कुटिया में आयेंगे, इसी बात को ध्यान में रखते हुए वह अपनी कुटिया को सदैव साफ-सुथरा रखा करती थी। 'प्रभु आयेंगे', ये वाणी सदा ही उसके कानों में गूँजा करती थी। सीता की खोज करते हुए जब राम और लक्ष्मण शबरी की कुटिया में आये, तब शबरी ने बेर खिलाकर उनका आदर-सत्कार किया। यह सोचकर कि बेर खट्टे और कड़वे तो नहीं हैं, इसीलिए पहले वह स्वयं बेर चखकर देखती और फिर राम और लक्ष्मण को खाने को देती। शबरी की इस सच्ची भक्ती, निष्टा और सहृदयता से राम ने उसे स्वर्ग प्राप्ति का वरदान दिया। स्वयं को योगाग्नि में भस्म करके शबरी सदा के लिये श्री राम के चरणों में लीन हो गयी।

पलायन

शबरी का वास्तविक नाम 'श्रमणा' था और वह भील समुदाय की 'शबरी' जाति से संबंध रखती थी। शबरी के पिता भीलों के राजा थे। शबरी जब विवाह के योग्य हुई तो उसके पिता ने एक दूसरे भील कुमार से उसका विवाह पक्का किया। विवाह के दिन निकट आये। सैकडों बकरे-भैंसे बलिदान के लिये इकट्ठे किये गये। इस पर शबरी ने अपने पिता से पूछा- 'ये सब जानवर क्यों इकट्ठे किये गये हैं?' पिता ने कहा- 'तुम्हारे विवाह के उपलक्ष में इन सब की बलि दी जायेगी।' यह सुनकर बालिका शबरी का सिर चकराने लगा कि यह किस प्रकार का विवाह है, जिसमें इतने प्राणियों का वध होगा। इससे तो विवाह न करना ही अच्छा है। ऐसा सोचकर वह रात्रि में उठकर जंगल में भाग गई।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. माता शबरी (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल.)। । अभिगमन तिथि: 11 अप्रैल, 2012।

संबंधित लेख

और पढ़ें

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः



"http://m.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=शबरी&oldid=585698" से लिया गया