भगीरथ  

संक्षिप्त परिचय
भगीरथ
भगीरथ तथा शिव
वंश-गोत्र इक्ष्वाकु वंश
पिता राजा दिलीप
शासन-राज्य अयोध्या
अन्य विवरण गंगा भगीरथ की पुत्री होने के कारण 'भागीरथी' कहलायी थीं।
यशकीर्ति भगीरथ अपनी अटूट तपस्या के बल पर गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाये थे।
संबंधित लेख सगर, गंगा, शिव
यज्ञ भगीरथ ने सौ अश्वमेध यज्ञ पूर्ण किये थे।
अन्य जानकारी सगर के पौत्र राजा भगीरथ ने सौ अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान किया था। अपने महान् यज्ञ के पूर्ण होने पर उन्होंने गंगा के किनारे दो स्वर्ण घाट बनवाये थे।

भगीरथ अयोध्या के इक्ष्वाकु वंशी राजा थे। वे अंशुमान के पौत्र और राजा दिलीप के पुत्र थे। सगर के बाद उनके पुत्र अंशुमान राजा हुए थे। अंशुमान अपने पुत्र दिलीप को राज्य-भार सौंप कर गंगा को पृथ्वी पर लाने की चिंता में ग्रस्त थे। उन्होंने घोर तपस्या करते हुए शरीर त्याग किया। राजा दिलीप गंगा को पृथ्वी पर लाने का कोई मार्ग नहीं सोच पाये और बीमार होकर स्वर्ग सिधार गये। भगीरथ के सामने अपने पितामह का वचन और पिता का तप था और उन्होंने तप में मन लगा दिया। अपनी कठिन साधना और घोर तपस्या के बल से उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न कर लिया और उनकी सहायता से गंगा को पृथ्वी पर लाने में सफल हुए।

ब्रह्मा द्वारा प्राप्त वर

भगीरथ पुत्रहीन थे। उन्होंने राज्यभार अपने मन्त्रियों को सौंपा और स्वयं गोकर्ण तीर्थ में जाकर घोर तपस्या करने लगे। ब्रह्मा के प्रसन्न होने पर उन्होंने दो वर माँगे—एक तो यह कि गंगा जल चढ़ाकर भस्मीभूत पितरों को स्वर्ग प्राप्त करवा पायें और दूसरा यह कि उनको कुल की सुरक्षा करने वाला पुत्र प्राप्त हो। ब्रह्मा ने उन्हें दोनों वर दिये, साथ ही यह भी कहा कि गंगा का वेग इतना अधिक है कि पृथ्वी उसे संभाल नहीं सकती। शंकर भगवान की सहायता लेनी होगी। ब्रह्मा के देवताओं सहित चले जाने के उपरान्त भगीरथ ने पैर के अंगूठों पर खड़े होकर एक वर्ष तक तपस्या की। शंकर ने प्रसन्न होकर गंगा को अपने मस्तक पर धारण किया। गंगा को अपने वेग पर अभिमान था। उन्होंने सोचा था कि उनके वेग से शिव पाताल में पहुँच जायेंगे। शिव ने यह जानकर उन्हें अपनी जटाओं में ऐसे समा लिया कि उन्हें वर्षों तक शिव-जटाओं से निकलने का मार्ग नहीं मिला।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. वाल्मीकि रामायण, बाल काण्ड, सर्ग 42, श्लोक 1-25, सर्ग 43, 1-43, सर्ग 44, श्लोक 1-6
  2. महाभारत वनपर्व, 108, 109।– द्रोणपर्व, 60।
  3. शिव पुराण, 11।22

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