इन्द्र  

इन्द्र
Indra

इंद्र वैदिक युग का प्रथम देवता था। उसे देवताओं के राजा (देवराज) के रूप में स्मरण किया गया है। ऋग्वेद के लगभग एक चौथाई मंत्रों में उसका उल्लेख है। इससे उसके महत्व और व्यापक प्रभाव का पता चलता है। उसे कहीं पर संज्ञावत का देवता बताया गया है जो बादलों में गर्जन और बिजली पैदा करता है। कहीं पर उसे सूर्य देवता माना गया है। परंतु उसका मुख्य महत्व देवताओं को विजयी बनाने के कारण है। यह विजय वह प्राकृतिक शक्तियों को अनुकूल बनाकर दिलाता है। साथ ही उन पर चपटी नाक वाले और काले आदिवासियों को पराजित करके भी जो आर्यों का विस्तार रोकते थे। इस प्रसंग में वृत्तासुर के संदर्भ का विशेष महत्व है। जिसका वध इंद्र ने दधीचि की हड्डियों के वज्र से किया था।

ऋग्वेद में इन्द्र

ऋग्वेद के प्राय: 250 सूक्तों में इन्द्र का वर्णन है तथा 50 सूक्त ऐसे हैं जिनमें दूसरे देवों के साथ इन्द्र का वर्णन है। इस प्रकार लगभग ऋग्वेद के चतुर्थांश में इन्द्र का वर्णन पाया जाता है। इससे हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि इन्द्र वैदिक युग का सर्वप्रिय देवता था। इन्द्र शब्द की व्युत्पत्ति एवं अर्थ अस्पष्ट है। अधिकांश विद्वानों की सम्मति में इन्द्र झंझावात का देवता है। जो बादलों में गर्जन एवं बिजली की चमक उत्पन्न करता है। किन्तु हिलब्रैण्ट के मत से इन्द्र सूर्य देवता है। वैदिक भारतीयों ने इन्द्र को एक प्रबल भौतिक शक्ति माना जो उनकी सैनिक विजय एवं साम्राज्यवादी विचारों का प्रतीक है। प्रकृति का कोई भी उपादान इतना शक्तिशाली नहीं जितना विद्युत-प्रहार। इन्द्र को अग्निदेव का जुड़वाँ भाई [1] कहा गया है जिससे विद्युतीय अग्नि एवं यज्ञवेदीय अग्नि का सामीप्य प्रकट होता है।

ऋग्वेद में अन्तरिक्ष स्थानीय 'इन्द्र' का वर्णन सर्वाधिक प्रतापी देवता के रूप में किया गया है, ऋग्वेद के क़रीब 250 सूक्तों में इनका वर्णन है। इन्हें वर्षा का देवता माना जाता था। उन्होंने वृक्ष राक्षस को मारा था इसीलिए उन्हें 'वृत्रहन' कहा जाता है। अनेक क़िलों को नष्ट कर दिया था, इस रूप में वे 'पुरन्दर' कहे जाते हैं। इन्द्र ने वृत्र की हत्या करके जल को मुक्त किया था इसलिए उन्हें 'पुर्मिद' कहा गया। इन्द्र के लिए एक विशेषण 'अन्सुजीत' (पानी को जीतने वाला) सम्बोधन भी आता है। इन्द्र के पिता 'द्योंस' हैं, 'अग्नि' उसका यमज भाई है और 'मरुत' उसका सहयोगी है। विष्णु के वृत्र के वध में इन्द्र की सहायता की थी। ऋग्वेद में इन्द्र को समस्त संसार का स्वामी बताया गया है। उसका प्रिय आयुद्ध 'बज्र' है इसलिए उन्हें 'ब्रजबाहू' भी कहा गया है। इन्द्र कुशल रथ-योद्धा (रथेष्ठ), महान् विजेता (विजेन्द्र) और सोम का पालन करने वाला 'सोमपा' है। इन्द्र तूफ़ान और मेघ के भी देवता है । एक शक्तिशाली देवता होने के कारण इन्द्र का 'शतक्रतु' (एक सौ शक्ति धारण करने वाला) कहा गया है, वृत्र का वध करने का कारण 'वृत्रहन' और 'मधवन' (दानशील) के रूप में जाना जाता है। उनकी पत्नी इन्द्राणी अथवा शची (ऊर्जा) हैं। प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में इन्द्र के साथ कृष्ण के विरोध का उल्लेख मिलता है।

इंद्र और विष्णु

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. ऋग्वेद .6.59.2
  2. ऋग्वेद मंडल 9
  3. छान्दोग्योपनिषद, अध्याय 8, खंड 7-15।–
  4. बाल्मीकि रामायण, युद्ध कांड, सर्ग 103, श्लोक, 2-13
  5. बाल्मीकि रामायण, युद्ध कांड, सर्ग 115, श्लोक, 4
  6. पउम चरित, 7।1-41।-

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