गणेश  

संक्षिप्त परिचय
गणेश
गणेश
अन्य नाम गजानन, लम्बोदर, एकदन्त, विनायक आदि
पिता शिव
माता पार्वती
जन्म विवरण भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को मध्याह्न के समय गणेश जी का जन्म हुआ था।
धर्म-संप्रदाय हिन्दू धर्म
विवाह ऋद्धि सिद्धि
मंत्र ॐ गं गणपतये नमः
वाहन शास्त्रों और पुराणों में सिंह, मयूर और मूषक को गणेश जी का वाहन बताया गया है।
प्रसाद बेसन के लड्डू
पर्व-त्योहार गणेश चतुर्थी, गणेशोत्सव
प्राकृतिक स्वरूप वे एकदन्त और चतुर्बाहु हैं। अपने चारों हाथों में वे क्रमश: पाश, अंकुश, मोदकपात्र तथा वरमुद्रा धारण करते हैं। वे रक्तवर्ण, लम्बोदर, शूर्पकर्ण तथा पीतवस्त्रधारी हैं। वे रक्त चन्दन धारण करते हैं तथा उन्हें रक्तवर्ण के पुष्प विशेष प्रिय हैं।
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अन्य जानकारी धार्मिक मान्यतानुसार हिन्दू धर्म में गणेश जी सर्वोपरि स्थान रखते हैं। सभी देवताओं में इनकी पूजा-अर्चना सर्वप्रथम की जाती है।

गणेश (अंग्रेज़ी: Ganesha) भारत के अति प्राचीन देवता हैं। ऋग्वेद में गणपति शब्द आया है। यजुर्वेद में भी ये उल्लेख है। अनेक पुराणों में गणेश की विरुदावली वर्णित है। पौराणिक हिन्दू धर्म में शिव परिवार के देवता के रूप में गणेश का महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्रत्येक शुभ कार्य से पहले गणेशजी की पूजा होती है। गणेश को यह स्थान कब से प्राप्त हुआ, इस संबंध में अनेक मत प्रचलित है।

कथा

पुराणों में गणेश के संबंध में अनेक आख्यान वर्णित है। एक के अनुसार शनि की दृष्टि पड़ने से शिशु गणेश का सिर जल कर भस्म हो गया। इस पर दुःखी पार्वती से ब्रह्मा ने कहा- जिसका सिर सर्वप्रथम मिले उसे गणेश के सिर पर लगा दो। पहला सिर हाथी के बच्चे का ही मिला। इस प्रकार गणेश ‘गजानन’ बन गए। दूसरी कथा के अनुसार गणेश को द्वार पर बिठा कर पार्वती स्नान करने लगीं। इतने में शिव आए और पार्वती के भवन में प्रवेश करने लगे। गणेश ने जब उन्हें रोका तो क्रुद्ध शिव ने उसका सिर काट दिया। एक दंत होने के संबंध में कथा मिलती है कि शिव-पार्वती अपने शयन कक्ष में थे और गणेश द्वार पर बैठे थे। इतने में परशुराम आए और उसी क्षण शिवजी से मिलने का आग्रह करने लगे। जब गणेश ने रोका तो परशुराम ने अपने फरसे से उनका एक दांत तोड़ दिया। एक के अनुसार आदिम काल में कोई यक्ष राक्षस लोगों को दुःखी करता था। कार्यों को निर्विघ्न संपन्न करने के लिए उसे अनुकूल करना आवश्यक था। इसलिए उसकी पूजा होने लगी और कालांतर में यही विघ्नेशवर या विघ्न विनायक कहलाए। जो विद्वान् गणेश को आर्येतर देवता मानते हुए उनके आर्य देव परिवार में बाद में प्रविष्ट होने की बात कहते हैं, उनके अनुसार आर्येतर गण में हाथी की पूजा प्रचलित थी। इसी से गजबदन गणेश की कल्पना और पूजा का आरंभ हुआ। यह भी कहा जाता है कि आर्येतर जातियों में ग्राम देवता के रूप में गणेश का रक्त से अभिषेक होता था। आर्य देवमंडल में सम्मिलित होने के बाद सिन्दूर चढ़ाना इसी का प्रतीक है। प्रारंभिक गणराज्यों में गणपति के प्रति जो भावना थी उसके आधार पर देवमंडल में गणपति की कल्पना को भी एक कारण माना जाता है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. गणेश पुराण के क्रीडाखण्ड(1।18-21

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